Can Shiv Sena Go It Alone?

The Shiv Sena, the party sulking for last almost four years, has decided to field its two candidates for the Nashik and Raigad-Ratnagiri-Sindhudurg local authorities constituencies for the Maharashtra Legislative Council elections. It effectively reinforces its stand to have no truck with Bharatiya Janata Party, its longtime ally and presently its bête noire. The election is scheduled to be held next month. A total of six local authorities constituencies would go to polls on May 21.
The politics in Maharashtra for the last few days has been marked by the overtures by BJP to form an alliance with Shiv Sena.Uddhav Thackeray, the executive president of Shiv Sena, announced earlier this year that the party would contest all future elections alone. The announcement was the culmination of a long drawn verbal duel between the two saffron parties. Ever since BJP rode to power, successively at the centre and in state, it rubbed its long time ally wrong way. In its zeal to acquire power on its own, BJP behaved with an aggressive high handedness that offended the party that have endured many a tempests together in over three-decade long journey.
Now the time has come for Shiv Sena to pay in the same coin. Its latest move is viewed as a snub to the BJP’s overtures. The Sena has announced Narendra Darade and Rajeev Sable for Nashik and Raigad-Ratnagiri-Sindhudurg constituencies, respectively as its candidates.The question is – can Shiv Sena maintain the momentum and pay the price of fighting its battles alone. The party may claim that it has a statewide presence but in reality, it is clustered in Mumbai, Konkan and to an extent Paschim (Western) Maharashtra area. Its support mainly from the urban areas. A large base of cadre has migrated first to the Maharashtra Navnirman Sena and now to BJP.
On the part of BJP, it indulged itself in many misadventures post-2014. Many of those misadventures actually paid dividends. However, the sense of realpolitik came soon and it started looking for mending fences with Shiv Sena. The BJP leaders including Chief Minister Devendra Fadnavis, Finance Minister Sudhir Mungantiwar and others have made no bones about their willingness to form an alliance with Shiv Sena. Even though Shiv Sena has resolutely said time and again that it will go alone, no one in political circles believed it. Shiv Sena clinging to power both in Centre as well as in state was seen as its fallibility.
uddhav thackeray devendra fadnavisIn fact BJP wants an alliance not only for this election to Legislative Council but also for next Lok Sabha and Assembly elections. Shiv Sena leadership has not only neglected those overtures, but discarded them out rightly. However, the changing dynamics of Maharashtra politics may force the party to have rethink of its steadfast and adamant stand.
The Congress and NCP that fought alone in last assembly election, against each other and against BJP as well as Shiv Sena also, are now coming closer. They have given enough signals that they may jump in the arena next time as one entity even at the national level. Congress leadership in the form of Rahul Gandhi and NCP (Sharad Pawar) have held meetings and deliberated on possible alliance. Since BJP has acquired many incomers from these parties. it may face no problem in facing the onslaught of combined strength of these parties. Moreover, it also has cadre that is already buoyed by successive victories of BJP in all levels of election. Shiv Sena can’t claim this type of comfort.
Moreover, CM Fadnavis has very shrewdly given prominence to MNS leader Raj Thackeray who is seen reviving his party’s lost fortune. By attacking Narendra Modi and Fadnavis as well, Raj Thackeray has tried to occupy opposition space that has been laying vacant due to the lackluster performance by Congress and NCP as opposition parties. Shiv Sena tried to play double game by being in power and at the same time being an opposition party. However, this plan did not work out very well. this was clear by its underperformance in elections after elections. So much so that it was humiliated in its own citadel Mumbai during the municipal election.
Shiv Sena’s strategy seems to rely on capitalizing on anti-incumbency factor and the anger over betrayal (by BJP). However, this anti-incumbency thing is a very dicey preposition – except for media and politically enthused social media circles, this factor has not been especially evident anywhere in the state. Again, this factor will benefit, if at all, to Congress NCP and not Shiv Sena because it was an equal partner in whatever the present government did or did not.
In such a scenario, Shiv Sena’s muscle flexing may actually backfire on it. The move may alienate it’s sympathizers and may erode of its voter base. For a solid display and exhibition of political strength, it may be a right move but for a long term gain and goodwill it may prove counterproductive.

ये धब्बे ऐसे धुलनेवाले नहीं!

कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने आखिर वह बात कबुल ही ली जिसे उनकी पार्टी लगातार नकारते आई है। खुर्शीद ने कांग्रेस को उसका वह दामन दिखा दिया जिससे वह कभी छुटकारा नहीं पा सकती। यह दीगर बात है, कि खुर्शीद ने कांग्रेस के दामन पर सिर्फ मुस्लिमों के खून के धब्बे होने की बात कही थी, जबकि सच यह है, कि उसका दामन मुस्लिम, हिंदू, सिक्ख ऐसे सभी जातियों और प्रांतों के लोगों के खून से सना है।
अपने दामन पर मुसलमानों के “खून के धब्बे” होने की बात कहकर खुर्शीद ने कांग्रेस को सकते में डाल दिया था। रविवार को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के डॉ. बीआर आंबेडकर हॉल में उन्होंने यह बात कही थी। और तबसे कांग्रेस बगलें झांक रही है। उनकी बात से पार्टी नेताओं के कान खड़े हो गए। कार्यकर्ताओं (बचे-खुचे) को काटो तो खून नहीं!
“1947 मे स्वतंत्रता के बाद हाशिमपुरा, मलियाना, मेरठ, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, भागलपुर, अलीगढ़, बाबरी मस्जिद आदि में मुसलमानों के नरसंहार में कांग्रेस पर मुसलमानों के खून के जो इतने सारे धब्बे हैं इनको आप किन शब्दों से धोना चाहेंगे,” खुर्शीद से यह सवाल पूछा था एएमयू के एक निलंबित छात्र आमिर मिंटोई ने।
इस पर खुर्शीद ने कहा, ‘‘यह राजनीतिक सवाल है। हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं। कांग्रेस का मैं भी हिस्सा हूं तो मुझे मानने दीजिये कि हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं। क्या आप यह कहना चाहते हैं कि चूंकि हमारे दामन पर खून के धब्बे लगे हुए हैं, इसलिए हमें आपके ऊपर होने वाले वार को आगे बढ़कर नहीं रोकना चहिए?‘‘
कांग्रेस प्रवक्ता पी. एल. पुनिया ने कहा है, कि कांग्रेस पार्टी सलमान खुर्शीद के बयान से पूरी तरह अलग करती है। सलमान खुर्शीद पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन जो बयान उन्होंने दिया है उससे कांग्रेस की असहमति है।
आखिर कांग्रेस ऐसे कितने मामलों से पल्लू झाड़ते रहेगी? आजादी से पहले और आजादी के बाद भी कांग्रेस ने हर वर्ग विशेष को लक्ष्यित करते हुए अत्याचार किए है। कांग्रेस एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने समाज के सभी वर्गों और लोगों को एकसमान प्रताडित किया है। शुरूआत तो बंटवारे के साथ ही हुई थी। उस वक्त पाकिस्तान से आए हिंदुओं को प्रताडित किया गया। अकेले महाराष्ट्र में ही ऐसी कई घटनाएं गिनाई जा सकती है।
उसके बाद महात्मा गांधी की हत्या के बाद आक्रोश के नाम पर कांग्रेसियों ने महाराष्ट्र में ब्राह्मणों पर अत्याचार किए। उनके घर फूंके, उन्हें अपने निवास और गांव से बेदखल किया। आलम यह है, कि पश्चिम महाराष्ट्र में आपको कई देहात ऐसे मिलेंगे जिनमें ब्राह्मण नहीं है। क्योंकि कांग्रेसियों के डर से समय ब्राह्मणों का बड़ी संख्या में पलायन हुआ। मान लिजिए, कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में जो हुआ उसका वह पहला प्रयोग था।

लगभग एक दशक बाद यही कांग्रेस सरकार थी जिसने संयुक्त महाराष्ट्र के लिए आंदोलन करनवाले बेकसूर लोगों पर गोलियां बरसाई। उस आंदोलन में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार ने पूरा बलप्रयोग किया और 105 लोगों की जानें ली। ये लोग कौन थे? ये हर वर्ग, हर जाति के लोग थे।
इसी कांग्रेस के लोगों ने मराठवाडा में नामांतरण आंदोलन के नाम पर दलितों पर अत्याचार किए। तत्कालीन मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बदलकर डा. बाबासाहब आंबेडकर विश्वविद्यालय करने की मांग दलित गुटों ने की थी। इसका विरोध करनेवाले गुटों में हालांकि शिवसेना जैसी पार्टियां भी ती लेकिन उनमें कांग्रेसी लोग अधिकतर थे। गांव-देहातों के दलितों का खून बहाया गया, कई जगहों पर सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ।
छिटपुट दंगों और झड़पों का तो जिक्र न करें तो ही बेहतर है। कांग्रेस ने किस-किसको अपना विरोधी नहीं बनाया? क्या कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हिंदूओं को “भगवा आतंकी” नहीं बताया था? क्या कांग्रेस ने कश्मीर से पंडितों के निष्कासन को मौन संमति नहीं दी? क्या कांग्रेस ने श्रीलंका के तमिल गुटों को पहले सहयोग देकर फिर उनसे किनारा नहीं किया? क्या कांग्रेस ने सिक्खों के अलगाववाद को चिंगारी देकर फिर उसे बुझाने की कोशिश नहीं की।
तो यह दामन खून ही खून से लथपथ पड़ा है। यह धब्बे ऐसे धुलनेवाले नहीं है, क्योंकि आप एक सिरो पर धोने की कोशिश करते हो तो दामन का दूसरा सिरा खून से और रंग जाता है। समझ लिजिए खुर्शीद साहब!

हरावे कसे, हे काँग्रेसने शिकावे

देशाच्या राजकारणात काँग्रेसचे स्थान आणि प्रभाव अनन्य आहे. देशाच्या कानाकोपऱ्यात त्याचे अस्तित्व आणि प्रभाव आहे. आता ही गोष्ट खरी, की हा प्रभाव आणि हे अस्तित्व अभूतपूर्व प्रमाणात कमी झाले आहे. तरीही, आपल्या पूर्वीचे गतवैभव प्राप्त करण्याइतके नसले तरी एक सन्माननीय, उल्लेखनीय स्थान परत मिळविण्याची त्याची क्षमता निश्चित आहे.
या पार्श्वभूमीवर काँग्रेसची केविलवाणी नाटके अधिकच दयनीय वाटू लागतात. त्यातून दिसून येते ती पक्षाची पराभूत मानसिकता – जणू आपला राजकीय संघर्ष राजकीय किंवा निवडणुकीय आखाड्यामध्ये करण्याची इच्छाशक्तीच हा पक्ष हरवून बसला आहे आणि त्याऐवजी घटनात्मक संस्थांना संशयाच्या घेऱ्यात आणण्याचा मार्ग तो पत्करत आहे. भारताचे सरन्यायाधीश दीपक मिश्रा यांच्याविरोधात जी चिखलफेक काँग्रेसने आरंभली आहे त्यातून त्याचे किती अधःपात झाले आहे, हे दिसून येते.
उपराष्ट्रपती आणि राज्यसभा अध्यक्ष एम. व्यंकय्या नायडू यांनी मिश्रा यांच्या महाभियोगासाठी विरोधी पक्षांनी दिलेली नोटीस फेटाळून लावली. सात विरोधी पक्षांनी गेल्या आठवड्यात ही नोटीस दिली होती. त्यात सरन्यायाधीशांच्या “गैरवर्तना”चे पाच आधार दिले होते. अन् या विरोधी पक्षांचे नेतृत्व करत होती काँग्रेस!
सोहराबुद्दीन शेख बनावट चकमक प्रकरणाची सुनावणी करणारे न्यायाधीश बी. एच. लोया यांच्या मृत्यूची निष्पक्ष चौकशीची मागणी करणारी याचिका सर्वोच्च न्यायालयाने फेटाळून लावली. त्यानंतर एका दिवसाने महाभियोगाची ही नोटिस देण्यात आली होती.
ही नोटिस फेटाळून लावण्याचा निर्णय घेण्यापूर्वी नायडू यांनी ज्येष्ठ कायदातज्ञांशी व घटनातज्ञांशी चर्चा केली. या ठरावाची व्यवहार्यता तपासण्यासाठी तज्ञांशी चर्चा केल्यानंतर एका दिवसाने त्यांनी हा निर्णय घेतला. विरोधी पक्षांनी शुक्रवारी सात पक्षांच्या 71 खासदारांच्या स्वाक्षऱ्या सादर केल्या होत्या. परंतु यातील सात खासदार आधीच निवृत्त झालेले असल्याचे आढळून आले.
“विरोधी पक्षांच्या नोटिसीवर सात पक्षांच्या 71 खासदारांच्या स्वाक्षऱ्या होत्या. यांपैकी सात खासदार निवृत्त झाले आहेत, परंतु स्वाक्षऱ्यांची संख्या ही आवश्यक असलेल्या 50 स्वाक्षऱ्यांपेक्षा जास्त आहेत,” असे काँग्रेसने पत्रकार परिषदेत सांगितले. परंतु हा लंगडा बचाव होता.
नायडू यांनी लोकसभेचे माजी सरचिटणीस सुभाष कश्यप, माजी विधि सचिव पी. के. मल्होत्रा, माजी विधिमंडळ सचिव संजय सिंह आणि राज्यसभा सचिवालयाच्या वरिष्ठ अधिकाऱ्यांशी चर्चा केली.
” मुख्य न्यायाधीशांच्या वर्तनाची चर्चा माध्यमांमध्ये करण्याची (विरोधी) सदस्यांची कृती ही औचित्य आणि संसदीय संकेतांच्या विरुद्ध आहे कारण त्यामुळे सरन्यायाधीश या संस्थेची अवमानना होते,” असे नायडू यांनी एका निवेदनात म्हटले.
राज्यघटनेनुसार सरन्यायाधीशांविरुद्ध केवळ सिद्ध झालेले गैलवर्तन किंवा अक्षमता या दोन कारणांनी महाभियोग चालवता येऊ शकतो. विरोधकांनी पाच कारणे दाखवली आहेत आणि ते गैरवर्तन आहेत, असे काँग्रेसचे म्हणणे आहे.

सर्व कायदेशीर तज्ज्ञांनी विरोधकांच्या या मोहिमेवर टीका केली आहे. सर्वोच्च न्यायालयाचे माजी माजी न्यायमूर्ती सुदर्शन रेड्डी यांनी ही आत्मघातकी कृती असल्याचे म्हटले आहे, तर माजी महाधिवक्ते सोली सोराबजी यांनी ती दुर्दैवी असल्याचे म्हटले आहे. आता प्रश्न असा आहे, की हा सेल्फ गोल करण्यावर काँग्रेस इतकी ठाम का आहे?
हे प्रकरण येथे थांबणारे नाही. काँग्रेसची नजर लागली आहे ती 2019 च्या सार्वत्रिक निवडणुकांवर आणि देशात भारतीय जनता पक्षाच्या विरोधात वातावरण असल्याचा तिचा समज आहे. त्यामुळे या संपूर्ण प्रकरणातून मिळता येईल तेवढा फायदा घेण्याचा काँग्रेसचा प्रयत्न आहे. म्हणूनच असंतोष आणि अविश्वासाला जास्तीत जास्त खतपाणी घालण्याचा तिचा प्रयत्न आहे. विद्यमान सरन्यायाधीशांविरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव येण्याची ही पहिलीच वेळ आहे. त्यामुळे त्याचे काय गंभीर परिणाम होतील, याचा विचार तिला करावा लागेल. पण तो तिने केलेला नाही यातून ती किती घायकुतीला आली आहे, हे कळते.
आपला पराभव मान्य करून अधिक जिद्दीने लढा देण्यासाठी काँग्रेसने तयार व्हावे, ही वेळ आता आली आहे. गुजरातमधील निवडणुकीत तिने अत्यंत जोरदार प्रचार मोहीम चालवली. त्यामुळे तिला काहीसा आधार आणि धुगधुगी मिळाली, परंतु ती पुन्हा राहुल गांधीवादी मार्गावर चालू लागली आहे. एकानंतर एक घोडचुका करत आहे. नक्की सांगता येत नाही, परंतु केंब्रिज अॅनालिटिकाचे बिंग फुटल्याचाही हा परिणाम असू शकतो. ते काहीही असो, आपल्या दीर्घकाळच्या राजवटीत तिनेच रूढ केलेल्या क्लृप्त्या तिला पुन्हा शिकाव्या लागतील. पण त्यासाठी तिला नेतृत्वात बदल करावे लागतील, घराण्याचे जोखड फेकावे लागेल आणि ते तर काँग्रेसजनांसाठी ‘अब्रह्मण्यम्’!
एकुणात, सध्या काँग्रेसचा एकमेव इलाज म्हणजे पराभव स्वीकारायला शिकणे!

Congress Should Learn to Accept Defeat

Congress as a party has an unparalleled stature and influence on the nation’s politics. It has the largest presence and influence in the every nook and corner of the country.  This influence and presence has receded to unprecedented level; that is a fact. However,  the fact remains that it has a potential to spring back to an honorable position, an appreciable position – even if does not match its glorious days.

On this backdrop, its humiliating theatrics become all the more pitiable. It points to its defeatist mentality showing  that it has lost willingness to fight its political battles in the political or electoral arenas and instead choosing to take shortcuts of maligning constitutional institutions. The slugfest that it has indulged itself  against the Chief Justice of India Dipak Mishra is a grim example of how low it has fallen.

Vice President of India and Rajya Sabha Chairman M. Venkaiah Naidu today rejected the notice given by opposition parties for impeachment of CJI Mishra citing lack of substantial. Seven opposition parties led had last week moved a notice before him for impeachment of the Chief Justice of India (CJI) on five grounds of “misbehaviour”.  And Congress is leading this pack of the opposition parties. The impeachment notice came a day after the Supreme Court rejected a bunch of petitions seeking an independent probe into the death of Judge B. H. Loya, who was hearing the Sohrabuddin Sheikh encounter case.

Naidu held extensive consultations with top legal and constitutional experts before taking the decision. The rejection of the notice comes a day after he held the consultations with experts to determine the maintainability of the motion. The opposition had submitted signatures of 71 lawmakers from seven parties on Friday. However, seven MPs of these signatories were found to be already retired. “The opposition notice had signatures of 71 lawmakers from seven parties. Seven of the lawmakers have retired since, but the number of signatures was well above the mandatory 50,” the Congress said in a press conference.

Naidu spoke to former Lok Sabha Secretary General, Subhash Kashyap, former Law Secretary PK Malhotra, former Legislative Secretary Sanjay Singh and senior officials of Rajya Sabha Secretariat over the issue.

“This act of members (opposition) of discussing the conduct of the CJI in the press is against propriety and parliamentary decorum as it denigrates the institution of CJI,” Naidu said in a statement . According to the constitution, Chief Justice Of India can be impeached only on grounds of proved misbehavior or incapacity. The opposition has backed its demand on five grounds, which, the Congress said, equals misbehavior.

All legal Experts have slammed the move. Former SC judge Sudarshan Reddy has termed this as a suicide move while former Solicitor General Soli Sorabjee has called it an unfortunate move. So the question is why Congress was Adamant on making this self goal?

The matter will not end here. With its eyes fixed on general elections in 2019 and an apparent atmosphere of discontent against BJP, Congress wants to harvest maximum yield from this entire episode and it is cultivating discontent and disbelief for the same reason. This is the first time ever that an impeachment notice has been filed against a sitting CJI. Therefore, it must understand the grave implications of its moves. That it did not shows its desperation.

The time has come for Congress to come to terms with defeat and prepare itself to fight with a determined spirit. It ran a brilliant campaign during Gujarat elections that gave it some mileage and breathers, but thereafter it is yet again on the Rahul Gandhian path, making one after another blunders. One doesn’t know but perhaps this has something to do with busting of Cambridge Analytica scandal. Whatever it may be, it has to learn the tricks of the rope that originally had brought to the board during its long regime. But for that, it has to go for a change in leadership, shedding the yoke of dynasty and that an anathema for it.

So all in all, the only remedy for it right now is to accept defeat.

जज लोया मृत्यू – झूठों का मुंह काला

न्या. लोया की मृत्यू के मामले में, जो अपने आप में साफ था, खुद उच्चतम न्यायालय ने सफाई दी है। अपना राजनीतिक अजेंडा चलाने के लिए जो लोग न्यायालय का उपयोग करना चाहते हैं उनके लिए इससे बड़ा तमाचा और नहीं हो सकता। न्या. बी. एच. लोया की मौत के के पीछे कोई भी गुत्थी नहीं थी और वह तू पूरी तरह से प्राकृतिक कारणों से हुई थी, यह न्यायालय ने बिना लाग लपेट के बता दिया।इतना ही नहीं इस पूरे मामले के पीछे कोई छुपा हुआ अजेंडा होने का का निरीक्षण भी दर्ज किया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्या. खानविलकर और डी. वाई. चंद्रचूड की तीन सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला साफ शब्दों में सुनाया है। हालांकि इससे सूचना युद्ध के सैनिकों पर कोई असर होने की गुंजाईश नहीं है।
देश की सभी यंत्रणाओं को लेकर संदेह पैदा करना, गलतफहमियां फैलाना और षड़यंत्र सिद्धांत प्रसारित करने का उनका काम बेखटके चलता रहगा। इस वर्ष के जनवरी महीने में मुख्य न्यायधीश के विरोध में पत्रकार वार्ता कर संदेह का माहैल खड़ा करनेवालों को भी उन्होंने जबरदस्त जमाल गोटा पिलाया है।
न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के वकील दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंग और प्रशांत भूषण को भी अच्छी खासी सुनाई है – सुस्पष्ट और निष्पक्ष! अर्थात् आधी रात के बाद न्यायालय के दरवाजे खोल कर साबित आतंकवादी को बचाने का नाट्य उसमें नहीं है, इसलिए उन्हें यह फैसला शायद रास ना आए। उस आशय की प्रतिक्रियाएं भी उनकी तरफ से आई है। संस्थात्मक औचित्य की (सिविलिटी) की साख न रखना और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विरोध में बेतरतीब आरोप करना, इसके लिए इन तीनों को न्यायालय ने खरी खोटी सुनाई है।
राजनैतिक, व्यक्तिगत और व्यापारी हित संबंधों के लिए जनहित याचिका (पीआइएल) का दुरुपयोग करने को लेकर भी पीठ ने उपदेश सुनाया है। इतना ही नहीं, सीधे-सीधे छूटे और पक्षपाती सामग्री प्रकाशित करनेवाले आंदोलनकारी माध्यमों पर भी न्यायालय ने कटाक्ष किया है। न्याय संस्था को कलंकित करने और न्यायतंत्र को गुमराह करने की यह कोशिश है, यह भी न्यायालय ने ही बता दिया है।
न्या. लोया का निधन दिसंबर 2014 में हार्ट अटैक के कारण हुआ था। नागपुर में अपने एक सहयोगी की बेटी की शादी के लिए कुछ सहयोगियों के साथ वे गए थे। सोहराबुद्दीन शेख के झूटे एन्काउंटर मामले की सुनवाई न्या. लोया के समक्ष चल रही थी।
इस मामले में एक आरोपी थे अमित शाह जो समय भाजपा के अध्यक्ष है। आज की घड़ी में नरेंद्र मोदी के बाद यदि कोई लिबरलों की आंख में खटकता है तो वह अमित शाह है!
निरंजन टकले नामक एक पेशेवर झूठी सामग्री लिखनेवाले पत्रकार ने उतनी ही बराबरी के कैरावान नामक पत्रिका में एक लेख प्रकाशित किया। न्या. लोया की मृत्यू संदेहजनक स्थिति में हुई। आरोपी को छुड़ाने के लिए उन्हें 100 करोड़ रुपयों की ओफर दी गई लेकिन उन्होंने उसे नकार दिया और इसलिए उनका अप्राकृतिक निधन हुआ, इस आशय की सामग्री उसमें थी। यह लेखन काफी हद तक सेमी फिक्शन के माफिक था। टकले की ख्याति ऐसी, कि उनके द्वारा प्रकाशित समाचार (जैसे सावरकर द्वारा माफी मांगना) और शेअर की हुई सामग्री (जैसे कल्पना इनामदार का गोपाल गोडसे की नातिन होना) झूठी साबित हुई है। इस पर प्रश्न पूछनेवाले को वे विकृत और पागल कह सकते हैं इतना लिबरल अधिकार उन्हें है।
कैरावान में प्रकाशित वह लेख वह सीधे-सीधे राजनैतिक अभिनिवेश से लिखा गया था। इसलिए भाजपा-विरोधी मीडिया ने उसे सिर-आंखों पर बिठाया। कांग्रेस पार्टी ने तो उसकी वकालत की ही, राहुल गांधी ने लोया की मृत्यू में भाजपा अध्यक्ष का हाथ होने का संकेत कई बार दिया। इस प्रकरण में उन्होंने पत्रकार वार्ता की थी और 150 सांसदो को साथ में लेकर वे राष्ट्रपति के पास भी पहुंचे थे।
अर्थात् इसमें इस प्रकरण में असल में ही कोई दम नहीं था इसलिए उस का प्रतिफल कुछ होने की संभावना भी नहीं थी। इंडियन एक्सप्रेस जैसे सीधे तौर पर सरकार विरोधी अखबार ने भी कैरावान के लेख को तार-तार कर दिया था। लेकिन न्यूज़ के नाम पर सोशल मीडिया पर ठिकरा फोड़नेवाले किसी भी कलमबाज़ ने इस सफेद झूठ को लेकर एक अक्षर भी नहीं निकाला। जो निकाला वह मोदी-शाह को तोप के मुंह में देने के लिए ही।

लेकिन इस मामले में शायद ऐसा कुछ हुआ जिसकी लिबरल गैंग के को उम्मीद नहीं थी। खुद न्यायाधीश और न्यायालय को ही मुलजिम के कटघरे में खड़ा करने के कारण उच्चतम न्यायालय ने तुरत-फुरत उसकी दखल ली और केवल तीन महीनों में इसकी सुनवाई पूरी की।
अर्थात् न्यायालय सत्य को उजागर करें यह लिबरलों का उद्देश था ही नहीं। जहां आग है वह धुआं है, यह आम मनुष्य की प्रवृत्ति है। इसलिए चाहे जिस तरह से हो इन्हें धुआं खड़ा करना है ताकि आग-आग के ललकारें वे लगा सकें। शायद ऐसा निर्णय आने का उन्हें अंदेशा था इसीलिए जनवरी महीने में न्याय तंत्र के ही कुछ लोगों ने विद्रोह का दृश्य मंचित किया था। अब दूध और पानी अलग होने के बावजूद दूध में पानी होने का संदेह कायम रहेगा।
न्यायाधीश पर ही गुर्रानेवाले वरिष्ठ वकील, सुपारी लेकर सामग्री प्रकाशित और प्रसारित करनेवाली मीडिया और पूरी तरह परावलंबी बुद्धि के गैर-जिम्मेदाराना राजनेताओं से न्यायतंत्र और देश को बचाने की जरूरत है।
लिबरलों का पसंदीदा वाक्य प्रयोग करें तो – “पहले कभी नहीं इतनी जरूरत है”!

लोया मृत्यू प्रकरण – खोट्याच्या कपाळी गोटा

न्यायमूर्ती लोया यांच्या मृत्यूच्या मुळातच संशयातीत असलेल्या प्रकरणात सर्वोच्च न्यायालयानेच निर्वाळा दिला आहे. स्वतःचा राजकीय कार्यक्रम चालविण्यासाठी जे लोक न्यायालयाचा वापर करू इच्छितात त्यांच्यासाठी यापेक्षा अधिक जबरदस्त चपराक असू शकत नाही. न्यायमूर्ती बी. एच. लोया यांच्या निधनामागे कोणतेही गूढ नव्हते आणि हा संपूर्णपणे नैसर्गिक कारणांमुळे झालेला मृत्यू होता, असे न्यायालयाने कोणताही आडपडदा न ठेवता सांगितले. इतकेच नव्हे, तर या याचिकेमागे एखादा छुपा हेतू असल्याचेही निरीक्षण नोंदविले. भारताचे मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ती ए. एम. खानविलकर आणि डी. वाय. चंद्रचूड यांच्या तीन सदस्यीय खंडपीठाने आपला फैसला स्वच्छ शब्दांत सुनावला. अर्थात माहितीयुद्धाच्या शिपायांना यामुळे फरक पडणार नाही. देशातील सर्व यंत्रणांबद्दल संशय निर्माण करणे, गैरसमज आणि कट-सिद्धांत (कन्स्पायरसी थेअरीज) पसरविणे ही त्यांची कामे सुखेनैव चालू राहणार आहेत. या वर्षीच्या जानेवारी महिन्यात मुख्य न्यायाधीशांच्या विरोधात पत्रकार परिषद घेऊन संशयाचे धुके निर्माण करणाऱ्या न्यायालयीन मुखंडांनाही त्यांनी परस्पर जमालगोटा दिला आहे.

न्या. चंद्रचूड यांनी संपूर्ण खंडपीठाच्या वतीने हा निकाल दिला आहे. यात याचिकाकर्त्यांचे वकील दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंग आणि प्रशांत भूषण यांनाही खडे बोल सुनावले आहेत – सुस्पष्ट व निष्पक्षपणे. अर्थात मध्यरात्रीनंतर न्यायालयाचे दरवाजे उघडून सुसिद्ध दहशतवाद्याला वाचविण्याचे नाट्य त्यात नसल्यामुळे त्यांना हा निकाल अळणी वाटणारच. तशा प्रतिक्रिया त्यांच्याकडून आल्याही आहेत. संस्थात्मक औचित्याची (सिव्हिलिटी) बून न राखणे आणि सर्वोच्च न्यायालयाच्या न्यायाधीशांविरूद्ध बेछूट आरोप कऱणे, याबद्दल या तिघांचीही कानउघाडणी न्यायालयाने केली आहे.

राजकीय, वैयक्तिक आणि व्यापारी हितसंबंधांसाठी सार्वजनिक हित याचिकांचा (पीआयएल) गैरवापर करण्याबद्दल खंडपीठाने चार उपदेशाचे बोलही सुनावले आहेत. इतकेच कशाला, सरळसरळ खोटा आणि पक्षपाती मजकूर प्रसिद्ध करणाऱ्या चळवळ्या माध्यमांवरही न्यायालयाने ताशेरे ओढले आहेत. न्यायसंस्थेला कलंकित करण्याचा आणि न्यायव्यवस्थेची दिशाभूल करण्याचा प्रयत्न करण्यात आल्याचेही खंडपीठाने म्हटले आहे.

न्या. लोया यांचे डिसेंबर 2014 मध्ये हृदयविकाराच्या झटक्याने निधन झाले होते. नागपूरच्या एका सहकाऱ्याच्या मुलीच्या लग्नासाठी ते काही न्यायाधीशांसोबत गेले होते. सोहराबुद्दीन शेख बनावट चकमक प्रकरणाची सुनावणी सीबीआय न्यायालयाकडे होती आणि ती सुनावणी न्या. लोयांसमोर चालू होती. या खटल्यातील एक आरोपी होते अमित शाह आणि ते सध्या भाजपाचे अध्यक्ष आहेत. आजच्या घडीला नरेंद्र मोदी यांच्याखालोखाल लिबरलांना जर कोणी खटकत असेल तर ते अमित शाह.

निरंजन टकले नावाच्या एका सराईत बनावट मजकूरबाजाने तितक्याच तोलामोलाच्या कॅराव्हान नावाच्या मासिकात एक लेख प्रकाशित केला. न्या. लोया यांचा मृत्यू संशयास्पद स्थितीत झाला. आरोपीला सोडविण्यासाठी त्यांना 100 कोटी रुपयांची ऑफर देण्यात आली पण त्यांनी तिला नकार दिला आणि त्यामुळे त्यांचा अनैसर्गिक मृत्यू झाला, अशा आशयाचा मजकूर त्यात होता. यातील लेखन हे बऱ्यापैकी सेमी-फिक्शन (अर्धकाल्पनिक) म्हणावे असे होते. टकले यांची ख्याती अशी, की त्यांनी प्रकाशित केलेल्या बातम्या (सावरकरांची माफी) किंवा शेअर केलेले साहित्य (कल्पना इनामदार या गोपाळ गोडसेंची नात असणे) या खोट्या निघाल्या आहेत. त्यावर प्रश्न विचारणाऱ्या लोकांना ते विकृत आणि वेडा म्हणू शकतात. एवढा लिबरल अधिकार त्यांच्याकडे आहे.
कॅराव्हानमधील तो लेख उघड उघड राजकीय अभिनिवेशाने लिहिला होता. त्यामुळे भाजपविरोधी माध्यमांनी त्याला डोक्यावर घेऊन नाचणे स्वाभाविकच होते. कॉंग्रेस पक्षाने तर त्याची भलामण केलीच; राहुल गांधींनी लोया यांच्या मृत्यूमागे भाजप अध्यक्षांचा हात असल्याचे अनेकदा सुचविले. या प्रकरणी पत्रकार परिषद घेतली होती. दीडशे खासदारांना सोबत घेऊन राष्ट्रपतींकडे गेले होते.

अर्थात यात आडातच काही पाणी नव्हते, त्यामुळे पोहऱ्यात काही असण्याचाही संभव नव्हता. इंडियन एक्स्प्रेससारख्या स्वच्छपणे सरकारविरोधी असणाऱ्या वृत्तपत्रानेही कॅराव्हानमधील लेखाच्या चिंधड्या उडविल्या होत्या. परंतु फेक न्यूजच्या नावाने सोशल मीडियावर आगपाखड करणाऱ्या एकाही लेखणीपुंगवाने एका पत्रकाराने केलेल्या या धडधडीत सत्यालापाबद्दल अवाक्षरही काढले नाही. असलेच, तर ते मोदी-शहा जोडगोळीला तोफेच्या तोंडी देण्यासाठीच!

पण लिबरल गँगला अनपेक्षित असे काही या प्रकरणात घडले असावे. खुद्द न्यायाधीश आणि न्यायालयालाच आरोपीच्या पिंजऱ्यात उभे केल्यामुळे सर्वोच्च न्यायालयाने त्याची तातडीने दखल घेतली आणि केवळ तीन महिन्यांत त्याची सुनावणी पूर्ण केली.

अर्थात न्यायालयाने सत्य समोर आणावे, हा लिबरलांचा मुळी उद्देशच नव्हता. एरवी त्यांच्या मुलाने खुलासा केल्यानंतरच हे प्रकरण थांबायला हरकत नव्हती. आगीशिवाय धूर असू शकत नाही, ही सर्वसामान्य मानवी वृत्ती आहे. त्यामुळे कुठल्याही मार्गाने का होईना धुराळा निर्माण करायचा आणि धूर-धूर म्हणून आगीचा आभास निर्माण करायचा, हा त्यांचा उद्देश आहे. हे असे निर्णय येण्याची अपेक्षा असल्यामुळेच असावे कदाचित परंतु जानेवारी महिन्यात न्यायव्यवस्थेतील काही जणांनी बंडाचा देखावा उभा करून तिथेही संशय निर्माण केला. आता दूध आणि पाणी वेगळे झाले तरी दुधात पाणी असल्याची शंका कायम राहणारच.
न्यायाधीशांवरच गुरकावणारे ज्येष्ठ वकील, सुपारी मजकूर छापणारे माध्यम आणि सर्वस्वी परभृत बुद्धीचे बेजबाबदार राजकारणी – न्यायव्यवस्थेला आणि देशाला त्यांच्यापासून वाचविण्याची गरज आहे. लिबरलांचे आवडते वाक्य वापरायचे तर ‘कधी नव्हे एवढी गरज आहे.’

काश केरल इंडिया में होता… काश श्रीजीत कश्मीरी होता!

इस देश में मानवाधिकार और अत्याचार विरोध के नाम पर एक बड़ा तबका सक्रिय है। देश में कहीं भी, कुछ भी घट रहा हो जिसमें ऊपरी तौर पर, सतही तौर पर कोई हिंदू अपराधी है तो यह वर्ग धड़ल्ले से आगे आकर अपनी बातें सामने रखता है। मेंढक को जिस तरह बारिश की सुगबुगाहट लगती है, गिद्ध को जैसे मांस की बू आती है, मच्छरों को जैसे गटर की खबर लगती है और चीटियों को जैसे गुड़ का पता चल लगता है वैसे ही इन लोगों को अत्याचार, ज़ुल्म और अन्याय आदि की सुगबुगाहट लगती है और तरह-तरह के चोलों में यह लोग सामने आने लगते है। लिबरल, सेकुलर माध्यमों के कृपा प्रसाद से इन्हें अच्छी खासी सुर्खियां भी मिल जाती है। इनकी शर्त बस इतनी होती है, कि इन सारी घटनाओं में पीड़ित व्यक्ति हिंदू नहीं होना चाहिए या उसे अपने भारतीयता पर गर्व नहीं होना चाहिए।

ऐसा नहीं होता तो इन लोगों के रडार पर सिर्फ कश्मीर के आतंकवादी या बस्तर के नक्सली नहीं होते। केरल में जिस तरह अपने भारतीय होने पर गर्व करने वालों पर जुल्म हो रहे है उसकी सुध बुध वह लोग जरूर लेते। श्रीनगर में किसी को जीप से बांधने पर इनका दिल जिस तरह कसमसाता है वैसे ही केरल में किसी का हाथ पांव तोड़ने पर उनके मन में टीस उठती।

अभी ताजा बात लीजिए। पिछले 2 दिनों से केरल जल रहा है। जम्मू कश्मीर के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव की घटनाओं के विरोध में केरल की कुछ कथित न्यायवादी संगठनों ने जगह-जगह मोर्चे निकालें। अब केरल में तो कम्युनिस्टों का राज है और जैसे कि कम्युनिस्ट शासन में होता ,है हर विरोध प्रदर्शन हिंसा में तब्दील हो जाता है। उसी तरह राज्य में कई स्थानों पर हिंसा हुई। खासकर कासरगोड जिले में नडप्पुरम, वडक्करा और पेरंबरा इन जगहों पर बुधवार को हुई हिंसा की कई घटनाएं दर्ज हुई। विलियापल्ली नामक गांव में भाजपा के कार्यालय पर हमला हुआ। पेरंबरा में शिवाजी सेना नामक संगठन के दो कार्यकर्ताओं पर बम हमला हुआ। अंदेशा यह है, कि यह हमला सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने किया।

केरल पुलिस का कहना है, कि कठुआ उन्नाव की घटनाओं के विरोध विभिन्न संगठनों ने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। पुलिस ने कहा कि हमने 900 लोगों को गिरफ्तार किया है। ये सभी लोग 16 अप्रैल को हड़ताल के नाम हिंसा कर रहे थे। गौरतलब है कि इस हड़ताल की पूर्व सूचना पुलिस को नहीं दी गई थी। ‘चलो कोजीकोड’ नामक इस मार्च की अपील व्हाट्सअप के माध्यम से एसडीपी के कार्यकर्ताओं ने फैलाई थी।

कुछ इसी तरह का मामला श्रीजीत का है। श्रीजीत नामक युवक को पुलिस ने एक खून के सिलसिले में गिरफ्तार किया था। पुलिस का कहना था की मृतक व्यक्ति के बेटे ने सृजित का नाम लिया था, इसलिए उसे गिरफ्तार किया गया था। हालांकि पुलिस कस्टडी में उसकी मौत हो गई। बाद में स्थानीय मीडिया ने जब मामला उछाला और उसकी तहकीकात की, तो पुलिस का यह बयान सफेद झूठ निकला। खुद मृतक के व्यक्ति ने कहा कि उसने श्रीजीत का नाम कभी नहीं लिया था। पूरी फजीहत होने के बाद सरकार ने सात पुलिसकर्मियों को निलंबित किया। इन पुलिसकर्मियों ने ताजा आरोप किया है, कि उन्हें फंसाया जा रहा है और वास्तविक दोषी कोई और है। यह कोई मायने नहीं रखता, कि श्रीजीत दलित था। चूंकि वह भाजपा से संबंधित था इसलिए उसका मरना वाजिब था शायद। 

लेकिन इस मामले की रत्ती भर भी रिपोर्टिंग खुद को राष्ट्रीय मीडिया कहलाने वालों ने या मानवाधिकार के पैरोकारों ने नहीं की। उनके लिए यह मामला जैसे कभी हुआ ही नहीं। और राज्य में कम्युनिस्टों द्वारा मारे गए अनगिनत संघ भाजपा या कांग्रेस कार्यकर्ताओं की तो हम बात ही नहीं कर रहे है। इस दोगलेपन को लिबरिजम या उदारवाद या सेकुलरिज्म कहते है।

लुटियंस की नगरी में सुस्थापित लिबरलियों और सेकुलरों के लिए आइडिया ऑफ इंडिया बहुत मायने रखती है। जब भी भारत की बात आती है, भारतीय परंपराओं का बखान होता है तब इस नेहरूवादी आइडिया ऑफ इंडिया की बातें काफी उछाली जाती है। चूंकि केरल में कम्युनिस्टों का दबदबा है और कम्युनिस्टों की हिंसा के भुक्तभोगी हिंदुत्ववादी शक्तियां है, इसलिए शायद उनके आइडिया ऑफ इंडिया के मानचित्र में केरल नहीं आता है। उनके मानवीय सरोकारों में श्रीजीत जैसे लोग नहीं आते है, क्योंकि शायद वह मनुष्य ना हो या फिर अधिकार प्राप्त करने की योग्यता उन मानवों में नहीं हो। बहरहाल, इस दोगलेपन का अपना एक तंत्र है जो हमें इससे अवगत नहीं होने देता। विचारों के परदे के पीछे उसे छुपाये रखता है।

शुक्र है हमारे पास सोशल मीडिया जैसे वैकल्पिक समाचार स्रोत है जिनके कारण यह दोगलापन समय-समय पर उजागर होता है। लेकिन एक चिंतित नागरिक के नाते यह विचार मन में अपने आप आता है, कि काश! इनके इंडिया में केरल होता, कि काश! श्रीजीत भी कश्मीरी होता!

खोट्या बातम्यांचे वाल्मिकी

एकोणीसाव्या शतकाचा शेवटचा काळ.

त्यावेळी फेसबुकही नव्हते अन् ट्विटरही नव्हते. सोशल मीडियाही नव्हता आणि इंटरनेटवर उपद्रव करणारे ट्रोलही नव्हते. इतकेच कशाला वापरकर्त्यांच्या मेंदूपर्यंत शिरून त्यांचे विचार जाणून घेणारी केम्ब्रिज अॅनालिटिकासुद्धा नव्हती. तो माध्यमांचा सुखाचा काळ असायला हवा होता. फक्त खऱ्या बातम्या, फक्त वस्तुनिष्ठ माहिती हीच यायला पाहिजे होती. कारण वृत्तपत्र म्हणजे सत्याचे ठेकेदार! वास्तवाचे पुजारी! ते देणार, पत्रकार मांडणार ते फक्त सत्य सत्य सत्य!

पण हे खरोखरच घडत होतं का? वृत्तपत्रांचे माध्यम बाळसे धरत होते त्याच वेळेस घडलेली ही कहाणीआहे. आपल्या वृत्तपत्राचा खप वाढविण्यासाठी एका वृत्तपत्र मालकाने खळबळ माजविण्याची जणू सुपारी घेतली होती. बऱ्याचदा अतिरंजित बातम्या किंवा चक्क खोट्या बातम्या छापून त्याने वाचकांमध्ये आपला आणण्याची कला आत्मसात केली होती. हा वृत्तपत्र मालक म्हणजे दुसरा तिसरा कोणी नसून आज ज्याच्या नावाने पत्रकारितेतील सर्वात प्रतिष्ठित असा पुलित्झर पुरस्कार दिला जातो तो जोसेफ पुलित्झर हा होता.

हा पुलित्झर आणि त्याचा कट्टर प्रतिस्पर्धी असलेल्या विल्यम् रँडॉल्फ हर्स्ट यांनी अमेरिकी पत्रकारितेतील सर्वात काळ्याकुट्ट युगाची सुरुवात केली. या दोघांनी मिळून अमेरिकी जनतेच्या भावनांना भडकावण्याचे काम इमानेइतबारे केले आणि 1898 मध्ये अमेरिका-स्पेन युद्ध त्यांनी घडवून आणले.
पुलित्झर हा ‘सेंट लुईस पोस्ट डिस्पॅच’ आणि ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ या वृत्तपत्रांचा प्रकाशक होता, तर हर्स्ट याचे ‘न्यूयॉर्क जर्नल’ हे वृत्तपत्र होते. पुलित्झर याचा जन्म हंगेरीत झाला होता. तो जर्मनी मार्गे अमेरिकेत आला होता तर हर्स्ट हा एका खाण मालकाचा मुलगा. वृत्तपत्रांची मालकी त्याला आपल्या वडिलांकडूनच मिळाली होती. पुलित्झर आणि हर्स्ट हे दोघेही डेमोक्रॅटिक पक्षाचे समर्थक होते तसेच ते शरणार्थ्यांच्या बाजूचे होते. या दोन्ही वृत्तपत्रांमध्ये यलो किड नावाचे एक व्यंगचित्र छापून येत असे. त्यावरून या पत्रकारितेला यलो किड जर्नालिझम हे नाव रूढ झाले आणि त्याचे संक्षिप्त रूप यलो जर्नलिझम असे झाले.
दोन्ही वृत्तपत्रांमध्ये गुन्ह्यांच्या बातम्या रंगवून रंगवून दिल्या जायच्या. अनेक वेळेस या बातम्या बनावटच असायचा.

जोसेफ पुलित्झर हा मूळचा हंगेरियन. १८६४ मध्ये तो अमेरिकेत आला. १८७२ मध्ये त्याने पहिल्यांदा “वेस्टलिशे पोस्ट’ हे वृत्तपत्र आणि त्यानंतर १८७९ मध्ये “सेंट लुईस डिस्पॅच’ हे वृत्तपत्र विकत घेतले. या दोन्ही वर्तमानपत्रांचे विलीनीकरण करून त्याने ” सेंट लुईस डिस्पॅच-पोस्ट’ नावाचे वर्तमानपत्र काढले. १८८२ मध्ये त्याने “न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ नावाचे वर्तमानपत्र विकत घेतले. हे वृत्तपत्र त्याने केवळ दोन सेंटमध्ये विकायला सुरुवात केले. त्यावेळी एवढ्या कमी किमतीत कुठलेही वृत्तपत्र उपलब्ध नव्हते. त्यामुळे नुकसानीत जाणारे हे वर्तमानपत्र पुलित्झरच्या स्पर्शाने पुन्हा जोमाने व्यवसाय करू लागले.

अन्य वृत्तपत्रांची स्पर्धा असायची त्याला काही कारण नव्हते. त्याच्या काळामध्ये या वृत्तपत्राचा खप 15000 आवरून 6 लाखांपर्यंत गेला होता. मात्र याच वेळेस हर्स्ट याने ‘न्यूयॉर्क जर्नल’ विकत घेतले आणि या दोघांमध्ये सुरू झाले वृत्तपत्र खपाचे युद्ध.

“सिटीझन केन’ हा चित्रपट माहितेय? विल्यम रॅंडॉल्फ हर्स्ट याच्या जीवनावर हा चित्रपट आधारलेला आहे. हर्स्ट हा अगदी वादग्रस्त आणि नफेखोर व्यक्तिमत्वाचा माणूस होता. स्वतःचे वर्तमानपत्रे खपविण्यासाठी कोणत्याही थराला जाण्याची त्याची तयारी होती. “सिटीझन केन’ हा चित्रपट त्याच्या जीवनावर आधारित असल्याची चर्चा चित्रपट निर्मिती अवस्थेत असतानाच सुरू होती. त्यामुळे हर्स्ट महाशय अस्वस्थ झाले असल्यास नवल नाही. त्याने या चित्रपटाच्या निर्मात्यांशी संपर्क साधला आणि चित्रपटाची सर्व रिळांची (मास्टर रिलसह) विल्हेवाट लावण्यासाठी मोठी रक्कम देऊ केली. मात्र निर्मात्यांनी त्याच्या या “ऑफरला’ नकार दिला. मग साम आणि दामच्या मार्गाचे प्रयत्न निष्फळ झाल्यानंतर दंडाच्या मार्गाचा त्याने वलंब केला. आपल्या वर्तमानपत्रातील गॉसिप लिहिणारी पत्रकार लुएला पार्सन्स हिला त्याने याकामी लावले. लुएला पार्सन्स ही टुडिओच्या अधिकारी आणि वितरकांना फोन करायची आणि त्यांच्या खासगी गोष्टी पेपरमध्ये छापण्याची धमकी देत असे.

हर्स्टच्या व्यावसायिक नीतिमत्तेवर १८९८ सालातील एक तार मोठा प्रकाश टाकते. स्वतःचे वर्तमानपत्र खपावे यासाठी हर्स्ट याला अमेरिका आणि स्पेनमध्ये क्‍युबाच्या मुद्द्यावरून युद्ध व्हावे, असे वाटत होते. “न्यू यॉर्क जर्नल’ या त्याच्या मुख्य वर्तमानपत्रात यासंबंधी अतिरंजीत आणि भडक भाषेतील मजकूर प्रकाशित होई. स्पेनने केलेल्या अत्याचारांच्या कहाण्या छापण्यासाठी त्याने आपल्या वार्ताहरांना ठिकठिकाणी पाठविले होते. हे वार्ताहर खऱ्या खोट्या बातम्याही पाठवत असत. जे प्रामाणिक होते ते अशा बातम्या पाठवत नसत. त्यामुळे त्यांना वैयक्तिकरीत्या नुकसानही झाले. अशाचपैकी एक जण होता फ्रेडरिक रेमिंग्टन. क्‍यूबात गेल्यानंतर त्याने हर्स्टला खऱ्या परिस्थितीची कल्पना देणारी तार पाठविली.

”इथे युद्ध होणार नाही. मी परत येतो.’

हर्स्टने त्याला उलट तार केली, “तू तिथेच थांब. तू छायाचित्रे पाठव. मी युद्ध सुरू करतो.’

अन्‌ खरोखर हर्स्टने आपल्या बातम्यांच्या जोरावर युद्ध सुरू केलेही.

या दोघांच्या खोट्या बातम्यांचे आणखी एक उदाहरण म्हणजे 15 फेब्रुवारी 1898 रोजी यूएसएस मेन (USS Maine) या जहाजावर झालेला स्फोट! या स्फोटाचे कारण खरे तर अज्ञात होते, परंतु न्यूयॉर्क वर्ल्डने शत्रूचा हल्ला झाल्यामुळे हे जहाज उद्ध्वस्त झाल्याची बातमी दिली. त्यासोबत स्फोटाचे चित्रसुद्धा होते. दुसरीकडे जर्नल वृत्तपत्राने तशीच एक बातमी दिली आणि या हल्ल्याबाबत जो कोणी माहिती देईल त्याला पन्नास हजार डॉलरचे इनाम देण्याची ही घोषणा केली. अर्थात ही केवळ वाचकांना खेचून घेण्याची कृती होती कारण मुळात हल्ला झालाच नव्हता.
मात्र अशा प्रकारची निकृष्ट पत्रकारिता करण्याबद्दल झालेली कुप्रसिद्धी या दोघांनाही भोवली. आयुष्याच्या उत्तर काळात पुलित्झर याला आपल्या कृत्यांचे लाज वाटू लागली त्याने नंतर आपला मार्ग सुधारून दर्जेदार उत्तम करण्याचा प्रयत्न केला आणि त्याचा प्रयत्न म्हणून त्याने पुलित्झर पुरस्कारांची निर्मिती केली. डायनामाईटचा शोध लावणाऱ्या नोबेलच्या नावाने शांततेचा पुरस्कार मिळून अनेक जण धन्य होतात, त्यातलाच हा प्रकार.

पुलित्झर यांचे हे स्मरण करण्याचे कारण म्हणजे दोनच दिवसांपूर्वी पुलित्झर पुरस्कारांची घोषणा करण्यात आली. दरवर्षी एप्रिलमध्ये ती होते. रॉयटर्स वृत्तसंस्थेचे छायाचित्रकार दानिश सिद्दीक्की यांना रोहिंग्या शरणार्थ्यांच्या छायाचित्रासाठी हा पुरस्कार जाहीर झाला आहे.

आज सोशल मीडियावर फक्त खोटेपणा असतो, त्यावर विश्वास ठेवता येत आणि वर्तमानपत्रे म्हणजे किती सोवळ्यातील शामराव असा तोरा मिरवित अनेक जण वावरत आहेत. या मंडळींना एक तर हा इतिहास माहीत नसतो किंवा माहीत असूनही बनचुकेपणा त्यांच्या अंगात भिनलेला असतो. या पुरस्कारांची महती गाताना किमान या खोट्या बातम्यांच्या वाल्मिकींचे स्मरण करायला हवे.

तमिळ राजकारणात आणखी एका वारसाचा सूर्योदय

ब्राह्मणी आणि उत्तर भारतीय (थोडक्यात आर्य) वर्चस्वाच्या विरोधात विद्रोह म्हणून उभा राहिलेल्या द्रविड राजकारणात फार काही जगावेगळे घडत नाही. उत्तरेतील मुलायमसिंह-लालूप्रसादांच्या बरोबरीने किंबहुना जास्तच वंश परंपरावादी राजकारण दक्षिणेतही घडते. फक्त त्याचे रंग वेगळे आहेत. आंध्र प्रदेशात चंद्राबाबू नायडूंनी आपला मुलगा नारा लोकेश याला अलगद पुढे आणले आहेच, कर्नाटकात एच. डी. देवेगौडा आणि कुमारस्वामी ही बाप-लेकांची जोडी प्रसिद्ध आहेच. तमिळनाडूत द्रविड राजकारणाचे अध्वर्यू असलेल्या करुणानिधी यांचे चिरंजीव एम. के. स्टॅलिन अनेक वर्षे त्यांच्या द्राविड मुन्नेट्र कळगमची धुरा वाहत आहेतच. आता त्यांची तिसरी पिढीही राजकारणात प्रवेश करत आहे.

स्टॅलिन यांचा मुलगा उदयनिधी स्टॅलिन याने नुकतेच आपल्या राजकीय प्रवेशाचे सूतोवाच केले आहे. आपण सक्रिय राजकारणात प्रवेश करणार आहोत, अशी घोषणाच त्यांनी केली आहे.

द्रामुकचे नेते आणि तमिळनाडूचे माजी मुख्यमंत्री करुणानिधी यांचे उदयनिधी हे नातू. मी राजकारणात आधीपासूनच होतो, परंतु आता सक्रिय होण्याचे ठरविले आहे, असे उदयनिधी यांनी सांगितले आहे.
उदयनिधी यांनी आतापर्यंत राजकारणात फारसे स्वारस्य नव्हते. उदयनिधी किंवा माझा जावई राजकारणात प्रवेश करणार नाहीत, असे दोन वर्षांपूर्वी निवडणुकीचा प्रचार करताना त्यांचे वडील एम. के. स्टॅलिन यांनी स्पष्टपणे सांगितले होते.

उलट राजकारणाच्या बरोबरीने तमिळनाडूची आणखी एक आवड असलेल्या चित्रपट क्षेत्रात ते रमले होते. निर्माता म्हणून सुरूवातीला तमिळ चित्रपट उद्योगात उदयनिधीचा प्रवेश झाला. ‘ओरु कल ओरु कन्नाडी’ हा त्याचा नायक म्हणून पहिला चित्रपट. नायक म्हणून त्यांची कारकीर्द बऱ्यापैकी चालली होती. द्रामुकचे मुखपत्र असलेल्या मुरासोली या वृत्तपत्राचे व्यवस्थापक-संपादक म्हणून काही महिन्यांपूर्वी त्यांची नियुक्ती झाली होती. त्यांच्या राजकीय प्रवेशाचे ते पहिले संकेत होते.

“माझा मुलगा, आणि माझे जावई राजकारणात सामील होणार नाहीत. माझ्या कुटुंबियातील कोणीही राजकारणात प्रवेश करणार नाही, याची ग्वाही मी देतो, ” असे स्टॅलिन म्हणाले होते. परंतु कमल हासन आणि रजनीकांत या दोन अभिनेत्यांच्या प्रवेशामुळे कदाचित दृश्य बदलले असावे. त्यामुळे तरुण रक्ताचे म्हणून कदाचित उदयनिधींना आणण्याच्या हालचाली सुरू झाल्या.

“माझे जन्म झाल्यापासून, मी राजकारणात आहे … मी जन्मापासूनच द्रामुकवादी आहे, द्रामुक माझ्या रक्तात आहे.मी चित्रपट उद्योगात प्रवेश करण्यापूर्वीपासून मी राजकारणात सक्रिय आहे. मी तलैवरांसाठी (करुणानिधी) व मुरासोली मारन यांच्यासाठी प्रचार केला आहे आणि वडिलांसोबत दौरेही केले आहेत. मी या सर्वांपासून काही काळ दूरच होतो, परंतु आता सगळेच कलाकार यात येत आहेत. मला वाटतं आता राजकारणात प्रवेश करण्याची वेळ आली आहे,” असे उदयनिधीने जानेवारी महिन्यात एका तमिळ संकेतस्थळाशी बोलताना सांगितले होते.

गेल्या महिन्यात देशात पुतळेतोडीचे सत्र सुरू असताना तमिळनाडूत पेरियार यांच्या पुतळ्याचीही विटंबना झाली होती. तेव्हा ट्विटरवरून प्रतिक्रिया देऊन त्यांनी आपली भूमिका मांडली होती.
“पेरियार ही एक व्यक्ती नव्हती. ती तमिळनाडूची अस्मिता आहे. एक पुतळा तोडला तर हजारो, लाखो उद्भवतील. मोडतोडीची इतकीच खुमखुमी असेल तर दिवस, वेळ आणि जागा सांगून ये” असे जाहीर आव्हान त्यांनी दिले होते.

स्टॅलिनचे जावई साबरीश यांना 2009 च्या विधानसभा निवडणुकीत पक्षाची माध्यमांतील प्रचार मोहीम राबविण्याचे श्रेय जाते. स्टॅलिन यांच्या अनेक राजकीय निर्णयांमागे त्यांचा हात असल्याचे म्हटले जाते.

कावेरी नदीच्या प्रश्नावरून अलीकडेच स्टॅलिन यांनी तिरुवारुरपासून कडलूरपर्यंत यात्रा काढली होती. त्या यात्रेत उदयनिधींचा सहभाग लक्षणीय होता. इतकेच नव्हे तर या यात्रेच्या समापनाच्या वेळेस कडलूर येथे त्यांचे भाषण झाले. त्या सभेसाठी निघताना उदयनिधीने आजोबा करुणानिधी यांच्या पाया पडून त्यांचे आशीर्वाद घेतले. या घटनेचा व्हिडियो सध्या तमिळनाडूत फिरत आहे.

द्रामुक (म्हणजे करुणानिधी) यांच्यावर घराणेशाहीचे आरोप फार पूर्वीपासून करण्यात येत आहेत. नेहरू-गांधी घराण्याची शैली तमिळनाडूत आणण्याची टीका त्यांच्यावर केली जाते. करुणानिधी यांचे ज्येष्ठ पुत्र एम.के. मुथु यांना पुढे आणण्यासाठी लोकप्रिय असूनही एम. जी. रामचंद्रन यांना दूर ठेवण्याचे प्रयत्न करण्यात आले होते. मुथू यांना द्रामुकचे पुढील नेते म्हणून चित्रित करण्यात येत होते. त्यावर नाराज होऊनच एमजीआर यांनी अण्णा द्रामुक पक्ष काढला आणि नंतरचा इतिहास ताजा आहे. त्यानंतर एम. के. स्टॅलिन यांच्याकडे नेतृत्व सोपविण्याचे प्रयत्न सुरू झाले. खुद्द स्टॅलिन यांना धोका ठरू नये, वैकोंना बाजूला करण्यात आले, असे अनेक राजकीय निरीक्षकांचे म्हणणे आहे. त्यामुळ द्रमुकमधून राजीनामा देऊन बाहेर पडलेले वैको हे या घराणेशाहीवर टीका करण्यात आघाडीवर आहेत.

आता उदयनिधी यांच्या रूपाने या नाट्याचा पुढचा अंक सुरू होत आहे. करुणानिधी हे आतापर्यंत कुडूम्ब अरसियल (कौटुंबिक राजकारण) करत होते, आता वारिसु अरसियल (आनुवंशिक राजकारण) सुरू झाले आहे, अशी मार्मिक टिप्पणी गांधी मक्कल इयक्कम या पक्षाचे संस्थापक तमिऴरुवी मनियन यांनी यावर केली आहे.

उगवता सूर्य हे द्रामुकचे निवडणूक चिन्ह. इतके दिवस मुरासोली मारन, दयानिधी मारन हे भाचे, अळगिरी आणि स्टॅलिन ही मुले, कनिमोऴी ही मुलगी अशा एक भलामोठा कुटुंबकबिला करुणानिधींनी राजकारणात आणला होता. त्यात नातवाच्या रूपाने आणखी एक सूर्योदय!

मार्क ज़करबर्ग – पकड़ा गया वह चोर

अमेरिकी सीनेट की वाणिज्य और न्यायपालिका समितियों की संयुक्त सुनवाई से पहले  फेसबुक के संस्थापक मार्क  ज़करबर्ग ने करोड़ों उपयोगकर्ताओं से माफी मांग ली। इस युवा अरबपति के लिए निश्चय ही यह एक शर्मिंदगी का पल होगा। इस माफी के बाद फेसबुक के खून के लिए प्यासी कई आत्माओं को तत्कालिक शांति मिल गई होगी।

फेसबुक के संस्थापक ने अपने चिर परिचित परिधान टी-शर्ट और जीन्स का त्याग कर बिजनेस सूट को अपनाया इसी से उनकी गंभीरता का पता चल जाता है। यह केवल एक सतही बदलाव नहीं था, बल्कि यह एक मनोदशा और मानसिकता के बदलाव का चिन्ह भी था। जहां टी-शर्ट और जीन्स युवा ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक है वहीं बिजनेस सूट गंभीरता और उत्तरदायीत्व का प्रतीक है। सुनवाई के समय यह परिधान कर ज़करबर्ग ने दिखा दिया, कि वे केवल इंटरनेट पर चलनेवाली किसी नवोन्मेषशाली वेबसाइट के खिलंदड़ मालिक नहीं है, बल्कि एक विश्वव्यापी साम्राज्य के मालिक है जो अपनी जिम्मेदारी भली-भांति समझता है।

ज़करबर्ग ने माना है कि कैंब्रिज एनालिटिका मामले में फेसबुक से हुई बड़ी गलती हुई है। ज़ुकरबर्ग ने एक लिखित बयान में कहा है कि वह निजी डाटा की गोपनीयता की सुरक्षा और इसके दुरूपयोग को रोकने में सोशल नेटवर्क की विफलता के लिए जिम्मदारी स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया के सदस्यों के डाटा के दुरूपयोग को रोकने के लिए सोशल मीडिया नेटवर्क ने पर्याप्त प्रयास नहीं किया।

लंदन की कैंब्रिज एनॉलेटिका कंपनी पर कथित रूप से फेसबुक के सदस्यों के डाटा का दुरूपयोग करने का आरोप है।कैम्ब्रिज एनालिटिका की मूल कंपनी एससीएल और डॉ. अलेक्जेंद्र कोगान ने डेटा एकत्र करने की इस ऐप को विकसित किया था। व्यक्तिगत डेटा की चोरी होने के दावों के बाद ये घोटाला सामने आया । इसका दुरुपयोग अमेरिकी राष्ट्रपति अभियान और यूरोपीय संघ के जनमत संग्रह के परिणाम को प्रभावित करने के लिए किया गया था।

इस सिलसिले में ज़करबर्ग ने सीधे तौर पर कंपनी की गलती स्वीकार करते हुए कहा है, कि यूजर्स के डेटा की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी हमारी है तथा ग्राहकों के डेटा की सुरक्षा करना उनकी जिम्मेदारी है। ज़करबर्ग ने कहा कि यह फ़ेसबुक और उन लोगों के साथ भी विश्वासघात है, जो अपनी जानकारियां हमारे साथ शेयर करते हैं।
अब ज़करबर्ग ने जो कुछ कहा है उससे सभी संतुष्ट हो यह ज़रुरी नहीं है। इसमें कोई शक नहीं, कि निजी डेटा की सुरक्षा एक अहम मुद्दा है। उपयोगकर्ताओं की व्यक्तिगत जानकारी के बदले में सामाजिक संपर्क प्रदान करनेवाला एक नया तंत्र हाल के वर्षों में उभरकर आया है। इसमें जो कंपनियां भागधारक है उनके छिपे इरादें समझना हर एक के बस की बात नहीं है। खासकर चुनावों के लिए मतदाताओं को लक्षित कर उनके मतों के रूझान को प्रभावित करना।

लेकिन यहां सवाल यह है, कि जिस हमाम में सब नंगे है उसमें केवल ज़करबर्ग को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? क्या इसलिए कि फेसबुक के चलते ही अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत होने का सिद्धांत लिबरलों ने मन ही मन पक्का मान लिया है?

गुगल से लेकर एप्पल तक हर कंपनी आपके डाटा का उपयोग करने पर तुली है। यहां हर कोई आपके वर्तमान को कब्ज़े में लेकर भविष्य को आकार देने का प्रयास कर रहा है। गुगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ऐरिक श्मिट ने सन् 2007 में फाइनेंशियल टाईम्स के साथ हुए एक इंटरव्यू में कहा था, कि “हमारा लक्ष्य गुगल उपयोगकर्ताओं को उस योग्य करना है कि वह ‘कल मुझे क्या करना चाहिए?’ और ‘मुझे कैसा काम करना चाहिए?’ जैसे प्रश्न पूछ सकें।” आज गुगल एसिस्टंट जैसे एप के जरिये यह लक्ष्य काफी हद तक साध्य किया जा चुका है।

श्मिट ने 2010 में वॉल स्ट्रीट जर्नल से एक अन्य साक्षात्कार में कहा था, “मुझे वास्तव में लगता है कि ज़्यादातर लोग यह नहीं चाहते कि गुगल उनके सवालों का जवाब दे, बल्कि वे चाहते हैं कि गुगल उन्हें यह बताए कि उन्हें आगे करना क्या है।” अब अगर उपयोगकर्ता की भूतकालीन और वर्तमानकालीन जानकारियां गुगल के पास होगी ही नहीं तो वह भविष्य की जानकारी क्या खाक देगा?

इसी ऐरिक श्मिट ने दिसम्बर 2010 में कहा था, कि “अगर आपके पास कुछ ऐसा है जो आप किसी और से जताना नहीं चाहते, तो शायद पहले स्थान में आपको ही वह नहीं करना चाहिए। अगर आपको वास्तविकता में वैसी गोपनियता चाहिए, तो फिर सच्चाई यह है कि खोज इंजन — गूगल सहित — कुछ समय के लिए वह जानकारी बनाए रखते हैं और यह महत्त्वपूर्ण है, उदाहरण के लिए, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका में हम सब पैट्रियट एक्ट (देशभक्त अधिनियम) के अधीन हैं और यह सम्भव है कि वह सब जानकारी अधिकारियों को उपलब्ध करायी जा सकती है।”

निजता के अधिकारों के लढ़नेवाले संगठन प्राइवेसी इंटरनेशनल ने गूगल को “गोपनीयता का प्रतिपक्षी” की संज्ञा दी है। क्या कोई गुगल के बिना इंटरनेट का उपयोग करने की आज सोच सकता है?

यह साइबर दुनिया है, यहां आपका डाटा ही असली मुद्रा है। इस मुद्रा का आदानप्रदान किए बिना यह बाजार चल ही नहीं सकता। इसमें से काफी सारी मुद्रा चोरी से ही आती है, यह बात साइबर दुनिया में बाज़ार लगानेवाला हर शख्स जानता है। ज़करबर्ग की गलती इतनी है कि उसका सिक्का ज्यादा चलता था और उसकी चोरी पकड़ी गई।