लाचार केजरीवाल और ठगे हुए समर्थक

दिल्ली में आगामी लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के बीच संभाव्य गठबंधन पर पूर्णविराम लग चुका है। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस ने राज्य में सातों लोकसभा सीटों के लिए आप के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन होने की संभावना मंगलवार को नकार दी। इन सातों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में विजय प्राप्त की थी। ऐसे में कांग्रेस और आप में मतों का विभाजन हुआ तो भाजपा को इस बार भी लाभ मिल सकता है। एक हिंदी टेलीविजन चैनल द्वारा सोमवार को किए गए सर्वेक्षण में बालाकोट के हवाई हमलों के बाद विशेष रूप से भाजपा की स्थिति मजबूत होने की पुष्टि की गई।

मंगलवार को दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित के साथ-साथ कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेताओं की बैठक पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हुई। इस अवसर पर स्थानीय नेताओं ने आप से गठबंधन न करने का आग्रह किया और राहुल गांधी ने भी इससे सहमति जताई। श्रीमती दीक्षित ने कहा, कि ‘हमने आम सहमति से निर्णय किया, कि आम आदमी पार्टी से गठबंधन नहीं करनी है और अपने बल पर चुनाव लड़ने है।’ अहमद पटेल और पी. सी. चाको जैसे कुछ नेता आप से गठजोड़ करने के पक्ष में थे, लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने इसका जोरदार विरोध किया। पंजाब कांग्रेस ने भी आप से किसी भी प्रकार गठबंधन करने से मनाही की। आप ने 2014 के चुनाव में पंजाब में 4 लोकसभा सीटों पर विजय प्राप्त की थी।

कांग्रेस के इस ताजा निर्णय से दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के प्रमुख अरविंद केजरीवाल तिलमिला गए। उन्होंने सीधे आरोप किया, कि कांग्रेस भाजपा की मदद कर रही है। उन्होंने ट्वीट किया, कि ‘सारा देश मोदी और शहा को हराने के लिए एकत्र आया है, ऐसे में कांग्रेस भाजपाविरोधी मतों का विभाजन कर भाजपा की सहायता कर रही है।’ इतना ही नहीं, उन्होंने संदेह जताया, कि कांग्रेस ने भाजपा से कोई गुप्त समझोता किया है।

केजरीवाल इस गठबंधन के लिए अत्यंत लालायित थे। इससे पूर्व भी उन्होंने गुहार लगाई थी, कि मैं कांग्रेस के दरवाजे पर खड़े रहकर थक चुका हूं लेकिन कोई हमारी सुध नहीं लेता। केवल दो सप्ताह पूर्व 16वीं लोकसभा के अंतिम सत्र के अंतिम दिन विरोधी दलों द्वारा आयोजित सभा में भी केजरीवाल ने हिस्सा लिया था। इस सभा की मेजबानी ही आप के पास थी। वरिष्ठ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा का केजरीवाल ने मंच पर स्वागत भी किया था। आज वही केजरीवाल ‘अच्छा सिला दिया मेरे प्यार का’ का राग आलापते हुए कांग्रेस को कोस रहे है।

एक समय था जब इसी कांग्रेस के खिलाफ जंग छेड़कर केजरीवाल ने देशवासियों का ध्यान आकर्षित किया था। कांग्रेस, खासकर शीला दीक्षित, भ्रष्टाचार की प्रतीक है यह बात उन्होंने पुरी शिद्दत से रखी थी। भ्रष्टाचार उन्मूलन और स्वच्छ राजनीति ही हमारा कार्यक्रम है, यह कहते हुए उन्होंने दिल्ली की सत्ता हथियाई थी। आज उसी कांग्रेस से नजदीकियां बढ़ाने के लिए केजरीवाल जद्दोजहद करते हुए दिखाई दे रहे है। राजनीति का चरित्र बदलने की भाषा करनेवाले नेता का चरित्र ही बदलते हुए देश देख रहा है। एक नायाब अवसरवादी के तौर पर केजरीवाल सामने आ रहे है। एक ऐसा नेता जो सत्ता के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकता है।

वास्तव में राजनीति सत्ता के लिए ही होती है। कम से कम आज के जमाने में तो यही देखने को मिलता है। लेकिन केजरीवाल ने हमेशा से ऐसा दिखाया है, कि जैसे भ्रष्टाचार विरोध की मशाल वे हाथ में थामे हुए चल रहे है। बढ़ी शातिरता से बनाई गई तस्वीर में अब दरारें आने लगी है।

केजरीवाल के पलटाव से उनके समर्थकों में खलबली मचना स्वाभाविक ही था। कुमार विश्वास जैसे उनके समर्थकों ने इस असंतोष को मार्ग दिखाया है। उन्होंने ट्विटर पर केजरीवाल पर निशाना साधते हुए उन्हें भिखारी की मिसाल दी।

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वैसे भी अन्ना हजारे को आगे करते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शामिल अधिकांश सहयोगी केजरीवाल को छोड़कर जा चुके है। केजरीवाल द्वारा पार्टी में तानाशाही चलाने का आरोप करने के बाद प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को अपमानजनक ढंग से पार्टी की कार्यकारिणी से निकाल दिया गया। उसके बाद एडमिरल एल. रामदास को पार्टी के अंतर्गत लोकपाल पद से त्वरित प्रभाव से बर्खास्त किया गया। पूर्व पत्रकार आशुतोष और कपिल मिश्रा कागजी तौर पर आज भी पार्टी में है लेकिन उनका अधिकांश समय नेतृत्व की आलोचना करने में बीतता है। विनोदकुमार बिन्नी, शाझिया इल्मी, जी. आर. गोपीनाथ, एस. पी. उदयकुमार, अशोक अग्रवाल और अंजली दमानिया जैसे सूरमा आज पार्टी से दूर है, जबकि किरण बेदी ने सीधे भाजपा का संग साधकर पुदुच्चेरी के राज्यपाल का पद प्राप्त किया।

यह तो बात हुई प्रमुख नेताओ की, फिर कार्यकर्ताओं के क्या हाल होंगे ? दूसके स्वतंत्रता संग्राम का नाम देकर दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन में उतरनेवाली एक पूरी पिढ़ी अब ठगा हुआ सा महसूस कर रही है। स्वतंत्रता संग्राम से नाता होने का दम भरनेवाली कांग्रेस को भ्रष्ट होने में चार दशक लगे, पार्टी विथ डिफरन्स कहलानेवाली भाजपा को सत्ताकांक्षी होने में तीन दशक लगे। लेकिन स्वच्छ चारित्र्य और शुचिता की हामी भरनेवाली आप का पतन होने में एक दशक से भी कम समय लगा। केवल केवळ आठ वर्षों में आप का सफर जिस पार्टी को बुरा-भला कहते हुआ उसका जन्म हुआ उसी पार्टी की ओर हो रहा है। इसे लोकतंत्र का खेल कहें या विडंबना?