Can Shiv Sena Go It Alone?

The Shiv Sena, the party sulking for last almost four years, has decided to field its two candidates for the Nashik and Raigad-Ratnagiri-Sindhudurg local authorities constituencies for the Maharashtra Legislative Council elections. It effectively reinforces its stand to have no truck with Bharatiya Janata Party, its longtime ally and presently its bête noire. The election is scheduled to be held next month. A total of six local authorities constituencies would go to polls on May 21.
The politics in Maharashtra for the last few days has been marked by the overtures by BJP to form an alliance with Shiv Sena.Uddhav Thackeray, the executive president of Shiv Sena, announced earlier this year that the party would contest all future elections alone. The announcement was the culmination of a long drawn verbal duel between the two saffron parties. Ever since BJP rode to power, successively at the centre and in state, it rubbed its long time ally wrong way. In its zeal to acquire power on its own, BJP behaved with an aggressive high handedness that offended the party that have endured many a tempests together in over three-decade long journey.
Now the time has come for Shiv Sena to pay in the same coin. Its latest move is viewed as a snub to the BJP’s overtures. The Sena has announced Narendra Darade and Rajeev Sable for Nashik and Raigad-Ratnagiri-Sindhudurg constituencies, respectively as its candidates.The question is – can Shiv Sena maintain the momentum and pay the price of fighting its battles alone. The party may claim that it has a statewide presence but in reality, it is clustered in Mumbai, Konkan and to an extent Paschim (Western) Maharashtra area. Its support mainly from the urban areas. A large base of cadre has migrated first to the Maharashtra Navnirman Sena and now to BJP.
On the part of BJP, it indulged itself in many misadventures post-2014. Many of those misadventures actually paid dividends. However, the sense of realpolitik came soon and it started looking for mending fences with Shiv Sena. The BJP leaders including Chief Minister Devendra Fadnavis, Finance Minister Sudhir Mungantiwar and others have made no bones about their willingness to form an alliance with Shiv Sena. Even though Shiv Sena has resolutely said time and again that it will go alone, no one in political circles believed it. Shiv Sena clinging to power both in Centre as well as in state was seen as its fallibility.
uddhav thackeray devendra fadnavisIn fact BJP wants an alliance not only for this election to Legislative Council but also for next Lok Sabha and Assembly elections. Shiv Sena leadership has not only neglected those overtures, but discarded them out rightly. However, the changing dynamics of Maharashtra politics may force the party to have rethink of its steadfast and adamant stand.
The Congress and NCP that fought alone in last assembly election, against each other and against BJP as well as Shiv Sena also, are now coming closer. They have given enough signals that they may jump in the arena next time as one entity even at the national level. Congress leadership in the form of Rahul Gandhi and NCP (Sharad Pawar) have held meetings and deliberated on possible alliance. Since BJP has acquired many incomers from these parties. it may face no problem in facing the onslaught of combined strength of these parties. Moreover, it also has cadre that is already buoyed by successive victories of BJP in all levels of election. Shiv Sena can’t claim this type of comfort.
Moreover, CM Fadnavis has very shrewdly given prominence to MNS leader Raj Thackeray who is seen reviving his party’s lost fortune. By attacking Narendra Modi and Fadnavis as well, Raj Thackeray has tried to occupy opposition space that has been laying vacant due to the lackluster performance by Congress and NCP as opposition parties. Shiv Sena tried to play double game by being in power and at the same time being an opposition party. However, this plan did not work out very well. this was clear by its underperformance in elections after elections. So much so that it was humiliated in its own citadel Mumbai during the municipal election.
Shiv Sena’s strategy seems to rely on capitalizing on anti-incumbency factor and the anger over betrayal (by BJP). However, this anti-incumbency thing is a very dicey preposition – except for media and politically enthused social media circles, this factor has not been especially evident anywhere in the state. Again, this factor will benefit, if at all, to Congress NCP and not Shiv Sena because it was an equal partner in whatever the present government did or did not.
In such a scenario, Shiv Sena’s muscle flexing may actually backfire on it. The move may alienate it’s sympathizers and may erode of its voter base. For a solid display and exhibition of political strength, it may be a right move but for a long term gain and goodwill it may prove counterproductive.

ये धब्बे ऐसे धुलनेवाले नहीं!

कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने आखिर वह बात कबुल ही ली जिसे उनकी पार्टी लगातार नकारते आई है। खुर्शीद ने कांग्रेस को उसका वह दामन दिखा दिया जिससे वह कभी छुटकारा नहीं पा सकती। यह दीगर बात है, कि खुर्शीद ने कांग्रेस के दामन पर सिर्फ मुस्लिमों के खून के धब्बे होने की बात कही थी, जबकि सच यह है, कि उसका दामन मुस्लिम, हिंदू, सिक्ख ऐसे सभी जातियों और प्रांतों के लोगों के खून से सना है।
अपने दामन पर मुसलमानों के “खून के धब्बे” होने की बात कहकर खुर्शीद ने कांग्रेस को सकते में डाल दिया था। रविवार को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के डॉ. बीआर आंबेडकर हॉल में उन्होंने यह बात कही थी। और तबसे कांग्रेस बगलें झांक रही है। उनकी बात से पार्टी नेताओं के कान खड़े हो गए। कार्यकर्ताओं (बचे-खुचे) को काटो तो खून नहीं!
“1947 मे स्वतंत्रता के बाद हाशिमपुरा, मलियाना, मेरठ, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, भागलपुर, अलीगढ़, बाबरी मस्जिद आदि में मुसलमानों के नरसंहार में कांग्रेस पर मुसलमानों के खून के जो इतने सारे धब्बे हैं इनको आप किन शब्दों से धोना चाहेंगे,” खुर्शीद से यह सवाल पूछा था एएमयू के एक निलंबित छात्र आमिर मिंटोई ने।
इस पर खुर्शीद ने कहा, ‘‘यह राजनीतिक सवाल है। हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं। कांग्रेस का मैं भी हिस्सा हूं तो मुझे मानने दीजिये कि हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं। क्या आप यह कहना चाहते हैं कि चूंकि हमारे दामन पर खून के धब्बे लगे हुए हैं, इसलिए हमें आपके ऊपर होने वाले वार को आगे बढ़कर नहीं रोकना चहिए?‘‘
कांग्रेस प्रवक्ता पी. एल. पुनिया ने कहा है, कि कांग्रेस पार्टी सलमान खुर्शीद के बयान से पूरी तरह अलग करती है। सलमान खुर्शीद पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन जो बयान उन्होंने दिया है उससे कांग्रेस की असहमति है।
आखिर कांग्रेस ऐसे कितने मामलों से पल्लू झाड़ते रहेगी? आजादी से पहले और आजादी के बाद भी कांग्रेस ने हर वर्ग विशेष को लक्ष्यित करते हुए अत्याचार किए है। कांग्रेस एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने समाज के सभी वर्गों और लोगों को एकसमान प्रताडित किया है। शुरूआत तो बंटवारे के साथ ही हुई थी। उस वक्त पाकिस्तान से आए हिंदुओं को प्रताडित किया गया। अकेले महाराष्ट्र में ही ऐसी कई घटनाएं गिनाई जा सकती है।
उसके बाद महात्मा गांधी की हत्या के बाद आक्रोश के नाम पर कांग्रेसियों ने महाराष्ट्र में ब्राह्मणों पर अत्याचार किए। उनके घर फूंके, उन्हें अपने निवास और गांव से बेदखल किया। आलम यह है, कि पश्चिम महाराष्ट्र में आपको कई देहात ऐसे मिलेंगे जिनमें ब्राह्मण नहीं है। क्योंकि कांग्रेसियों के डर से समय ब्राह्मणों का बड़ी संख्या में पलायन हुआ। मान लिजिए, कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में जो हुआ उसका वह पहला प्रयोग था।

https://platform.twitter.com/widgets.js


लगभग एक दशक बाद यही कांग्रेस सरकार थी जिसने संयुक्त महाराष्ट्र के लिए आंदोलन करनवाले बेकसूर लोगों पर गोलियां बरसाई। उस आंदोलन में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार ने पूरा बलप्रयोग किया और 105 लोगों की जानें ली। ये लोग कौन थे? ये हर वर्ग, हर जाति के लोग थे।
इसी कांग्रेस के लोगों ने मराठवाडा में नामांतरण आंदोलन के नाम पर दलितों पर अत्याचार किए। तत्कालीन मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बदलकर डा. बाबासाहब आंबेडकर विश्वविद्यालय करने की मांग दलित गुटों ने की थी। इसका विरोध करनेवाले गुटों में हालांकि शिवसेना जैसी पार्टियां भी ती लेकिन उनमें कांग्रेसी लोग अधिकतर थे। गांव-देहातों के दलितों का खून बहाया गया, कई जगहों पर सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ।
छिटपुट दंगों और झड़पों का तो जिक्र न करें तो ही बेहतर है। कांग्रेस ने किस-किसको अपना विरोधी नहीं बनाया? क्या कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हिंदूओं को “भगवा आतंकी” नहीं बताया था? क्या कांग्रेस ने कश्मीर से पंडितों के निष्कासन को मौन संमति नहीं दी? क्या कांग्रेस ने श्रीलंका के तमिल गुटों को पहले सहयोग देकर फिर उनसे किनारा नहीं किया? क्या कांग्रेस ने सिक्खों के अलगाववाद को चिंगारी देकर फिर उसे बुझाने की कोशिश नहीं की।
तो यह दामन खून ही खून से लथपथ पड़ा है। यह धब्बे ऐसे धुलनेवाले नहीं है, क्योंकि आप एक सिरो पर धोने की कोशिश करते हो तो दामन का दूसरा सिरा खून से और रंग जाता है। समझ लिजिए खुर्शीद साहब!

हरावे कसे, हे काँग्रेसने शिकावे

देशाच्या राजकारणात काँग्रेसचे स्थान आणि प्रभाव अनन्य आहे. देशाच्या कानाकोपऱ्यात त्याचे अस्तित्व आणि प्रभाव आहे. आता ही गोष्ट खरी, की हा प्रभाव आणि हे अस्तित्व अभूतपूर्व प्रमाणात कमी झाले आहे. तरीही, आपल्या पूर्वीचे गतवैभव प्राप्त करण्याइतके नसले तरी एक सन्माननीय, उल्लेखनीय स्थान परत मिळविण्याची त्याची क्षमता निश्चित आहे.
या पार्श्वभूमीवर काँग्रेसची केविलवाणी नाटके अधिकच दयनीय वाटू लागतात. त्यातून दिसून येते ती पक्षाची पराभूत मानसिकता – जणू आपला राजकीय संघर्ष राजकीय किंवा निवडणुकीय आखाड्यामध्ये करण्याची इच्छाशक्तीच हा पक्ष हरवून बसला आहे आणि त्याऐवजी घटनात्मक संस्थांना संशयाच्या घेऱ्यात आणण्याचा मार्ग तो पत्करत आहे. भारताचे सरन्यायाधीश दीपक मिश्रा यांच्याविरोधात जी चिखलफेक काँग्रेसने आरंभली आहे त्यातून त्याचे किती अधःपात झाले आहे, हे दिसून येते.
उपराष्ट्रपती आणि राज्यसभा अध्यक्ष एम. व्यंकय्या नायडू यांनी मिश्रा यांच्या महाभियोगासाठी विरोधी पक्षांनी दिलेली नोटीस फेटाळून लावली. सात विरोधी पक्षांनी गेल्या आठवड्यात ही नोटीस दिली होती. त्यात सरन्यायाधीशांच्या “गैरवर्तना”चे पाच आधार दिले होते. अन् या विरोधी पक्षांचे नेतृत्व करत होती काँग्रेस!
सोहराबुद्दीन शेख बनावट चकमक प्रकरणाची सुनावणी करणारे न्यायाधीश बी. एच. लोया यांच्या मृत्यूची निष्पक्ष चौकशीची मागणी करणारी याचिका सर्वोच्च न्यायालयाने फेटाळून लावली. त्यानंतर एका दिवसाने महाभियोगाची ही नोटिस देण्यात आली होती.
ही नोटिस फेटाळून लावण्याचा निर्णय घेण्यापूर्वी नायडू यांनी ज्येष्ठ कायदातज्ञांशी व घटनातज्ञांशी चर्चा केली. या ठरावाची व्यवहार्यता तपासण्यासाठी तज्ञांशी चर्चा केल्यानंतर एका दिवसाने त्यांनी हा निर्णय घेतला. विरोधी पक्षांनी शुक्रवारी सात पक्षांच्या 71 खासदारांच्या स्वाक्षऱ्या सादर केल्या होत्या. परंतु यातील सात खासदार आधीच निवृत्त झालेले असल्याचे आढळून आले.
“विरोधी पक्षांच्या नोटिसीवर सात पक्षांच्या 71 खासदारांच्या स्वाक्षऱ्या होत्या. यांपैकी सात खासदार निवृत्त झाले आहेत, परंतु स्वाक्षऱ्यांची संख्या ही आवश्यक असलेल्या 50 स्वाक्षऱ्यांपेक्षा जास्त आहेत,” असे काँग्रेसने पत्रकार परिषदेत सांगितले. परंतु हा लंगडा बचाव होता.
नायडू यांनी लोकसभेचे माजी सरचिटणीस सुभाष कश्यप, माजी विधि सचिव पी. के. मल्होत्रा, माजी विधिमंडळ सचिव संजय सिंह आणि राज्यसभा सचिवालयाच्या वरिष्ठ अधिकाऱ्यांशी चर्चा केली.
” मुख्य न्यायाधीशांच्या वर्तनाची चर्चा माध्यमांमध्ये करण्याची (विरोधी) सदस्यांची कृती ही औचित्य आणि संसदीय संकेतांच्या विरुद्ध आहे कारण त्यामुळे सरन्यायाधीश या संस्थेची अवमानना होते,” असे नायडू यांनी एका निवेदनात म्हटले.
राज्यघटनेनुसार सरन्यायाधीशांविरुद्ध केवळ सिद्ध झालेले गैलवर्तन किंवा अक्षमता या दोन कारणांनी महाभियोग चालवता येऊ शकतो. विरोधकांनी पाच कारणे दाखवली आहेत आणि ते गैरवर्तन आहेत, असे काँग्रेसचे म्हणणे आहे.

https://platform.twitter.com/widgets.js

सर्व कायदेशीर तज्ज्ञांनी विरोधकांच्या या मोहिमेवर टीका केली आहे. सर्वोच्च न्यायालयाचे माजी माजी न्यायमूर्ती सुदर्शन रेड्डी यांनी ही आत्मघातकी कृती असल्याचे म्हटले आहे, तर माजी महाधिवक्ते सोली सोराबजी यांनी ती दुर्दैवी असल्याचे म्हटले आहे. आता प्रश्न असा आहे, की हा सेल्फ गोल करण्यावर काँग्रेस इतकी ठाम का आहे?
हे प्रकरण येथे थांबणारे नाही. काँग्रेसची नजर लागली आहे ती 2019 च्या सार्वत्रिक निवडणुकांवर आणि देशात भारतीय जनता पक्षाच्या विरोधात वातावरण असल्याचा तिचा समज आहे. त्यामुळे या संपूर्ण प्रकरणातून मिळता येईल तेवढा फायदा घेण्याचा काँग्रेसचा प्रयत्न आहे. म्हणूनच असंतोष आणि अविश्वासाला जास्तीत जास्त खतपाणी घालण्याचा तिचा प्रयत्न आहे. विद्यमान सरन्यायाधीशांविरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव येण्याची ही पहिलीच वेळ आहे. त्यामुळे त्याचे काय गंभीर परिणाम होतील, याचा विचार तिला करावा लागेल. पण तो तिने केलेला नाही यातून ती किती घायकुतीला आली आहे, हे कळते.
आपला पराभव मान्य करून अधिक जिद्दीने लढा देण्यासाठी काँग्रेसने तयार व्हावे, ही वेळ आता आली आहे. गुजरातमधील निवडणुकीत तिने अत्यंत जोरदार प्रचार मोहीम चालवली. त्यामुळे तिला काहीसा आधार आणि धुगधुगी मिळाली, परंतु ती पुन्हा राहुल गांधीवादी मार्गावर चालू लागली आहे. एकानंतर एक घोडचुका करत आहे. नक्की सांगता येत नाही, परंतु केंब्रिज अॅनालिटिकाचे बिंग फुटल्याचाही हा परिणाम असू शकतो. ते काहीही असो, आपल्या दीर्घकाळच्या राजवटीत तिनेच रूढ केलेल्या क्लृप्त्या तिला पुन्हा शिकाव्या लागतील. पण त्यासाठी तिला नेतृत्वात बदल करावे लागतील, घराण्याचे जोखड फेकावे लागेल आणि ते तर काँग्रेसजनांसाठी ‘अब्रह्मण्यम्’!
एकुणात, सध्या काँग्रेसचा एकमेव इलाज म्हणजे पराभव स्वीकारायला शिकणे!

जज लोया मृत्यू – झूठों का मुंह काला

न्या. लोया की मृत्यू के मामले में, जो अपने आप में साफ था, खुद उच्चतम न्यायालय ने सफाई दी है। अपना राजनीतिक अजेंडा चलाने के लिए जो लोग न्यायालय का उपयोग करना चाहते हैं उनके लिए इससे बड़ा तमाचा और नहीं हो सकता। न्या. बी. एच. लोया की मौत के के पीछे कोई भी गुत्थी नहीं थी और वह तू पूरी तरह से प्राकृतिक कारणों से हुई थी, यह न्यायालय ने बिना लाग लपेट के बता दिया।इतना ही नहीं इस पूरे मामले के पीछे कोई छुपा हुआ अजेंडा होने का का निरीक्षण भी दर्ज किया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्या. खानविलकर और डी. वाई. चंद्रचूड की तीन सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला साफ शब्दों में सुनाया है। हालांकि इससे सूचना युद्ध के सैनिकों पर कोई असर होने की गुंजाईश नहीं है।
देश की सभी यंत्रणाओं को लेकर संदेह पैदा करना, गलतफहमियां फैलाना और षड़यंत्र सिद्धांत प्रसारित करने का उनका काम बेखटके चलता रहगा। इस वर्ष के जनवरी महीने में मुख्य न्यायधीश के विरोध में पत्रकार वार्ता कर संदेह का माहैल खड़ा करनेवालों को भी उन्होंने जबरदस्त जमाल गोटा पिलाया है।
न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के वकील दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंग और प्रशांत भूषण को भी अच्छी खासी सुनाई है – सुस्पष्ट और निष्पक्ष! अर्थात् आधी रात के बाद न्यायालय के दरवाजे खोल कर साबित आतंकवादी को बचाने का नाट्य उसमें नहीं है, इसलिए उन्हें यह फैसला शायद रास ना आए। उस आशय की प्रतिक्रियाएं भी उनकी तरफ से आई है। संस्थात्मक औचित्य की (सिविलिटी) की साख न रखना और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विरोध में बेतरतीब आरोप करना, इसके लिए इन तीनों को न्यायालय ने खरी खोटी सुनाई है।
राजनैतिक, व्यक्तिगत और व्यापारी हित संबंधों के लिए जनहित याचिका (पीआइएल) का दुरुपयोग करने को लेकर भी पीठ ने उपदेश सुनाया है। इतना ही नहीं, सीधे-सीधे छूटे और पक्षपाती सामग्री प्रकाशित करनेवाले आंदोलनकारी माध्यमों पर भी न्यायालय ने कटाक्ष किया है। न्याय संस्था को कलंकित करने और न्यायतंत्र को गुमराह करने की यह कोशिश है, यह भी न्यायालय ने ही बता दिया है।
न्या. लोया का निधन दिसंबर 2014 में हार्ट अटैक के कारण हुआ था। नागपुर में अपने एक सहयोगी की बेटी की शादी के लिए कुछ सहयोगियों के साथ वे गए थे। सोहराबुद्दीन शेख के झूटे एन्काउंटर मामले की सुनवाई न्या. लोया के समक्ष चल रही थी।
इस मामले में एक आरोपी थे अमित शाह जो समय भाजपा के अध्यक्ष है। आज की घड़ी में नरेंद्र मोदी के बाद यदि कोई लिबरलों की आंख में खटकता है तो वह अमित शाह है!
निरंजन टकले नामक एक पेशेवर झूठी सामग्री लिखनेवाले पत्रकार ने उतनी ही बराबरी के कैरावान नामक पत्रिका में एक लेख प्रकाशित किया। न्या. लोया की मृत्यू संदेहजनक स्थिति में हुई। आरोपी को छुड़ाने के लिए उन्हें 100 करोड़ रुपयों की ओफर दी गई लेकिन उन्होंने उसे नकार दिया और इसलिए उनका अप्राकृतिक निधन हुआ, इस आशय की सामग्री उसमें थी। यह लेखन काफी हद तक सेमी फिक्शन के माफिक था। टकले की ख्याति ऐसी, कि उनके द्वारा प्रकाशित समाचार (जैसे सावरकर द्वारा माफी मांगना) और शेअर की हुई सामग्री (जैसे कल्पना इनामदार का गोपाल गोडसे की नातिन होना) झूठी साबित हुई है। इस पर प्रश्न पूछनेवाले को वे विकृत और पागल कह सकते हैं इतना लिबरल अधिकार उन्हें है।
कैरावान में प्रकाशित वह लेख वह सीधे-सीधे राजनैतिक अभिनिवेश से लिखा गया था। इसलिए भाजपा-विरोधी मीडिया ने उसे सिर-आंखों पर बिठाया। कांग्रेस पार्टी ने तो उसकी वकालत की ही, राहुल गांधी ने लोया की मृत्यू में भाजपा अध्यक्ष का हाथ होने का संकेत कई बार दिया। इस प्रकरण में उन्होंने पत्रकार वार्ता की थी और 150 सांसदो को साथ में लेकर वे राष्ट्रपति के पास भी पहुंचे थे।
अर्थात् इसमें इस प्रकरण में असल में ही कोई दम नहीं था इसलिए उस का प्रतिफल कुछ होने की संभावना भी नहीं थी। इंडियन एक्सप्रेस जैसे सीधे तौर पर सरकार विरोधी अखबार ने भी कैरावान के लेख को तार-तार कर दिया था। लेकिन न्यूज़ के नाम पर सोशल मीडिया पर ठिकरा फोड़नेवाले किसी भी कलमबाज़ ने इस सफेद झूठ को लेकर एक अक्षर भी नहीं निकाला। जो निकाला वह मोदी-शाह को तोप के मुंह में देने के लिए ही।

लेकिन इस मामले में शायद ऐसा कुछ हुआ जिसकी लिबरल गैंग के को उम्मीद नहीं थी। खुद न्यायाधीश और न्यायालय को ही मुलजिम के कटघरे में खड़ा करने के कारण उच्चतम न्यायालय ने तुरत-फुरत उसकी दखल ली और केवल तीन महीनों में इसकी सुनवाई पूरी की।
अर्थात् न्यायालय सत्य को उजागर करें यह लिबरलों का उद्देश था ही नहीं। जहां आग है वह धुआं है, यह आम मनुष्य की प्रवृत्ति है। इसलिए चाहे जिस तरह से हो इन्हें धुआं खड़ा करना है ताकि आग-आग के ललकारें वे लगा सकें। शायद ऐसा निर्णय आने का उन्हें अंदेशा था इसीलिए जनवरी महीने में न्याय तंत्र के ही कुछ लोगों ने विद्रोह का दृश्य मंचित किया था। अब दूध और पानी अलग होने के बावजूद दूध में पानी होने का संदेह कायम रहेगा।
न्यायाधीश पर ही गुर्रानेवाले वरिष्ठ वकील, सुपारी लेकर सामग्री प्रकाशित और प्रसारित करनेवाली मीडिया और पूरी तरह परावलंबी बुद्धि के गैर-जिम्मेदाराना राजनेताओं से न्यायतंत्र और देश को बचाने की जरूरत है।
लिबरलों का पसंदीदा वाक्य प्रयोग करें तो – “पहले कभी नहीं इतनी जरूरत है”!

लोया मृत्यू प्रकरण – खोट्याच्या कपाळी गोटा

न्यायमूर्ती लोया यांच्या मृत्यूच्या मुळातच संशयातीत असलेल्या प्रकरणात सर्वोच्च न्यायालयानेच निर्वाळा दिला आहे. स्वतःचा राजकीय कार्यक्रम चालविण्यासाठी जे लोक न्यायालयाचा वापर करू इच्छितात त्यांच्यासाठी यापेक्षा अधिक जबरदस्त चपराक असू शकत नाही. न्यायमूर्ती बी. एच. लोया यांच्या निधनामागे कोणतेही गूढ नव्हते आणि हा संपूर्णपणे नैसर्गिक कारणांमुळे झालेला मृत्यू होता, असे न्यायालयाने कोणताही आडपडदा न ठेवता सांगितले. इतकेच नव्हे, तर या याचिकेमागे एखादा छुपा हेतू असल्याचेही निरीक्षण नोंदविले. भारताचे मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ती ए. एम. खानविलकर आणि डी. वाय. चंद्रचूड यांच्या तीन सदस्यीय खंडपीठाने आपला फैसला स्वच्छ शब्दांत सुनावला. अर्थात माहितीयुद्धाच्या शिपायांना यामुळे फरक पडणार नाही. देशातील सर्व यंत्रणांबद्दल संशय निर्माण करणे, गैरसमज आणि कट-सिद्धांत (कन्स्पायरसी थेअरीज) पसरविणे ही त्यांची कामे सुखेनैव चालू राहणार आहेत. या वर्षीच्या जानेवारी महिन्यात मुख्य न्यायाधीशांच्या विरोधात पत्रकार परिषद घेऊन संशयाचे धुके निर्माण करणाऱ्या न्यायालयीन मुखंडांनाही त्यांनी परस्पर जमालगोटा दिला आहे.

न्या. चंद्रचूड यांनी संपूर्ण खंडपीठाच्या वतीने हा निकाल दिला आहे. यात याचिकाकर्त्यांचे वकील दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंग आणि प्रशांत भूषण यांनाही खडे बोल सुनावले आहेत – सुस्पष्ट व निष्पक्षपणे. अर्थात मध्यरात्रीनंतर न्यायालयाचे दरवाजे उघडून सुसिद्ध दहशतवाद्याला वाचविण्याचे नाट्य त्यात नसल्यामुळे त्यांना हा निकाल अळणी वाटणारच. तशा प्रतिक्रिया त्यांच्याकडून आल्याही आहेत. संस्थात्मक औचित्याची (सिव्हिलिटी) बून न राखणे आणि सर्वोच्च न्यायालयाच्या न्यायाधीशांविरूद्ध बेछूट आरोप कऱणे, याबद्दल या तिघांचीही कानउघाडणी न्यायालयाने केली आहे.

राजकीय, वैयक्तिक आणि व्यापारी हितसंबंधांसाठी सार्वजनिक हित याचिकांचा (पीआयएल) गैरवापर करण्याबद्दल खंडपीठाने चार उपदेशाचे बोलही सुनावले आहेत. इतकेच कशाला, सरळसरळ खोटा आणि पक्षपाती मजकूर प्रसिद्ध करणाऱ्या चळवळ्या माध्यमांवरही न्यायालयाने ताशेरे ओढले आहेत. न्यायसंस्थेला कलंकित करण्याचा आणि न्यायव्यवस्थेची दिशाभूल करण्याचा प्रयत्न करण्यात आल्याचेही खंडपीठाने म्हटले आहे.

न्या. लोया यांचे डिसेंबर 2014 मध्ये हृदयविकाराच्या झटक्याने निधन झाले होते. नागपूरच्या एका सहकाऱ्याच्या मुलीच्या लग्नासाठी ते काही न्यायाधीशांसोबत गेले होते. सोहराबुद्दीन शेख बनावट चकमक प्रकरणाची सुनावणी सीबीआय न्यायालयाकडे होती आणि ती सुनावणी न्या. लोयांसमोर चालू होती. या खटल्यातील एक आरोपी होते अमित शाह आणि ते सध्या भाजपाचे अध्यक्ष आहेत. आजच्या घडीला नरेंद्र मोदी यांच्याखालोखाल लिबरलांना जर कोणी खटकत असेल तर ते अमित शाह.

निरंजन टकले नावाच्या एका सराईत बनावट मजकूरबाजाने तितक्याच तोलामोलाच्या कॅराव्हान नावाच्या मासिकात एक लेख प्रकाशित केला. न्या. लोया यांचा मृत्यू संशयास्पद स्थितीत झाला. आरोपीला सोडविण्यासाठी त्यांना 100 कोटी रुपयांची ऑफर देण्यात आली पण त्यांनी तिला नकार दिला आणि त्यामुळे त्यांचा अनैसर्गिक मृत्यू झाला, अशा आशयाचा मजकूर त्यात होता. यातील लेखन हे बऱ्यापैकी सेमी-फिक्शन (अर्धकाल्पनिक) म्हणावे असे होते. टकले यांची ख्याती अशी, की त्यांनी प्रकाशित केलेल्या बातम्या (सावरकरांची माफी) किंवा शेअर केलेले साहित्य (कल्पना इनामदार या गोपाळ गोडसेंची नात असणे) या खोट्या निघाल्या आहेत. त्यावर प्रश्न विचारणाऱ्या लोकांना ते विकृत आणि वेडा म्हणू शकतात. एवढा लिबरल अधिकार त्यांच्याकडे आहे.
कॅराव्हानमधील तो लेख उघड उघड राजकीय अभिनिवेशाने लिहिला होता. त्यामुळे भाजपविरोधी माध्यमांनी त्याला डोक्यावर घेऊन नाचणे स्वाभाविकच होते. कॉंग्रेस पक्षाने तर त्याची भलामण केलीच; राहुल गांधींनी लोया यांच्या मृत्यूमागे भाजप अध्यक्षांचा हात असल्याचे अनेकदा सुचविले. या प्रकरणी पत्रकार परिषद घेतली होती. दीडशे खासदारांना सोबत घेऊन राष्ट्रपतींकडे गेले होते.

अर्थात यात आडातच काही पाणी नव्हते, त्यामुळे पोहऱ्यात काही असण्याचाही संभव नव्हता. इंडियन एक्स्प्रेससारख्या स्वच्छपणे सरकारविरोधी असणाऱ्या वृत्तपत्रानेही कॅराव्हानमधील लेखाच्या चिंधड्या उडविल्या होत्या. परंतु फेक न्यूजच्या नावाने सोशल मीडियावर आगपाखड करणाऱ्या एकाही लेखणीपुंगवाने एका पत्रकाराने केलेल्या या धडधडीत सत्यालापाबद्दल अवाक्षरही काढले नाही. असलेच, तर ते मोदी-शहा जोडगोळीला तोफेच्या तोंडी देण्यासाठीच!

पण लिबरल गँगला अनपेक्षित असे काही या प्रकरणात घडले असावे. खुद्द न्यायाधीश आणि न्यायालयालाच आरोपीच्या पिंजऱ्यात उभे केल्यामुळे सर्वोच्च न्यायालयाने त्याची तातडीने दखल घेतली आणि केवळ तीन महिन्यांत त्याची सुनावणी पूर्ण केली.

अर्थात न्यायालयाने सत्य समोर आणावे, हा लिबरलांचा मुळी उद्देशच नव्हता. एरवी त्यांच्या मुलाने खुलासा केल्यानंतरच हे प्रकरण थांबायला हरकत नव्हती. आगीशिवाय धूर असू शकत नाही, ही सर्वसामान्य मानवी वृत्ती आहे. त्यामुळे कुठल्याही मार्गाने का होईना धुराळा निर्माण करायचा आणि धूर-धूर म्हणून आगीचा आभास निर्माण करायचा, हा त्यांचा उद्देश आहे. हे असे निर्णय येण्याची अपेक्षा असल्यामुळेच असावे कदाचित परंतु जानेवारी महिन्यात न्यायव्यवस्थेतील काही जणांनी बंडाचा देखावा उभा करून तिथेही संशय निर्माण केला. आता दूध आणि पाणी वेगळे झाले तरी दुधात पाणी असल्याची शंका कायम राहणारच.
न्यायाधीशांवरच गुरकावणारे ज्येष्ठ वकील, सुपारी मजकूर छापणारे माध्यम आणि सर्वस्वी परभृत बुद्धीचे बेजबाबदार राजकारणी – न्यायव्यवस्थेला आणि देशाला त्यांच्यापासून वाचविण्याची गरज आहे. लिबरलांचे आवडते वाक्य वापरायचे तर ‘कधी नव्हे एवढी गरज आहे.’

राहुल गांधी और दलितों का ‘महाभोज’

मन्नू भंडारी की एक प्रसिद्ध कृति है ‘महाभोज’। किसी दलित व्यक्ति की मृत्यू, उस पर खड़ा उठनेवाला राजनैतिक बंवड़र और राजनैतिक दलों की गुलाटियां, इनका गजब का चित्रण भंडारीजी ने किया है। इस पुस्तक का सरसरी पठन करनेवाला भी हतप्रभ रह जाता है, कि किस तरह लेखक (लेखिकाएं) समय से आगे जाकर देख सकती है।

उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित सरोहा नामक गांव में विधान सभा की एक सीट के लिए चुनाव सर पर है। बिसेसर तथा बिसू नामक एक कार्यकर्ता दलित की हत्या होती है। बिसेसर हरिजन बस्ती के अपने लोगों न्याय दिलाने के लिए लढ़नेवाला व्यक्ति है। उसकी मौत के बाद उसका दोस्त बिंदेश्वरी उर्फ़ बिंदा उसके प्रतिरोध की विरासत आगे ले जाना चाहता है। लेकिन बिंदा को भी राजनीति और अपराध के चक्र में फांसकर जेल में डाला जाता है। उसके बाद एक राजनीति की बिसात पर बिसात बिछती जाती है और सत्ताधारी वर्ग, सत्ता प्रतिपक्ष, मीडिया और नौकरशाही जैसे कई खिलाड़ी जुड़ते जाते है। यह एक नंगी तस्वीर है, कि किस तरह शासन और तंत्र मिलकर दलितों, गरिबों को कुचलते है। उनका हक मारते है और उन्हें न्याय दिलाने के नाम पर अपनी जेबें भरते है।

जनवरी 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या ने की, तबसे जो माहौल लिबरलों और मीडिया ने बनाया है वह बरबस ‘महाभोज’ की याद दिलाता है। सेकुलरिज्म का दम भरनेवाले दलों और वाम-झुकाववाली मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी, कि भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में दलितों पर अत्याचार चरम पर है और यह एक पूर्णतः जातिवादी शासन है। ऐसे लोगों के लिए यह बताना उचित होगा, कि मन्नू भंडारीजी का यह उपन्यास सर्वप्रथम 1979 में रचित था। यह वर्ष वह है जब भाजपा का वर्चस्व छोड़ो, उसका अस्तित्व भी नहीं था। वह अपने पूर्ववर्ती चोले यानि जन संघ के रूप में भी नहीं थी। वह जनता पार्टी नामक एक कुनबे का हिस्सा थी जिसमें हर रंग के दल शामिल थे।

स्पष्ट है, कि दलितों पर अत्याचार हमारे देश का दुःखद वास्तव है। इसमें कांग्रेस और भाजपा के शासन में फर्क करना उचित नहीं होगा। बल्कि सच्चाई यह है, कि अगड़ी जातियों के वर्चस्व के कारण कई बार कांग्रेस ने दलित अत्याचार में बड़ी भूमिका निभाई है। जिस समय भंडारीजी का ‘महाभोज’ आया था, लगभग उसी समय महाराष्ट्र में दलित पैंथर का उदय हुआ था। राज्य के कई गांवों में दलितों पर हुए अत्याचार के खिलाफ एक उग्र विद्रोह के रूप में यह आंदोलन खड़ा हुआ था। पैंथर कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर दलित बस्तियों से भेंट करते और अत्याचारियों से दो हाथ करते।

इस सारे इतिहास से बेखबर होकर, या कहें कि उसकी तरफ आंखें मूंदकर, दलितों पर लगातार हो रहे अत्याचार के मुद्दे पर कांग्रेस ने देशव्‍यापी उपवास शुरू किया। उसमें जो फजीहत उसकी हुई है वह बिल्कुल स्वाभाविक है। जिसका अपना गिरेबां साफ नहीं वह और को क्या उपदेश देगा?

धरना और उपवास के पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एक रेस्तरां में खाना खाते हुए देखे गए। रेस्तरां में कांग्रेस नेताओं की छोले भटूरे खाती हुई तस्वीर भी वायरल हुई। कांग्रेस नेता अरविंदर सिंह लवली ने तो बाकायदा मान लिया, कि ये तस्वीरें सोमवार सुबह से पहले की है। उससे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को लेकर भी कांग्रेस को शर्मिंदगी उठानी पड़ी। यह उपवास एक उपहास बनकर रह गया और इसके लिए सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस जिम्मेदार है।

कांग्रेस की इस नौटंकी ने अगर कुछ साबित किया है तो यह, कि वह अभी भी दिखावे की राजनीति औरलोगों की भावनाओं से खेलने में अभी भी नहीं हिचकिचाती है। राजनीतिक दल इस खेल में माहीर तो थे ही, वे अब बेशर्मी की हदें भी पार कर गए है। एससी-एसटी एक्ट पर जो फैसला दिया है वह उच्चतम न्यायालय ने दिया है। लेकिन राहुल गांधी इसका ठिकरा भाजपा के सर पर फोड़ रहे है।वैसे कांग्रेस यह भी बताएं, कि आखिर वह इतनी ही दलित हितैषी थी तो उसके 40 वर्षों के शासन के पश्चात् इस एससी-एसटी एक्ट को 1989 में बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ी?
तात्पर्य यह, कि कांग्रेस को सचमुच दलितों की चिंता होती तो इस ‘महाभोज’ का आयोजन नहीं होता।

यह तो बस कर्नाटक विधानसभा चुनाव की कार्यशाला और सन 2019 के आम चुनाव का अभ्यास है, बस!

महाभियोग – भयतंत्र का एक पैंतरा

भारत के प्रधान न्यायाधीश ( सीजेआई) दीपक मिश्रा पर महाभियोग चलाने की पहल सरासर पक्षपातपूर्ण राजनीति से प्रेरित है। यह एक अशुभ और अनुचित कदम है। इससे हासिल तो कुछ होनेवाला नहीं है, लेकिन एक संवैधानिक संस्था के सार्वजनिक रूतबे पर यह जरूर प्रहार करेगा। इस तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर टूटते विश्वास में ही इजाफा होगा। हमारे सार्वजनिक जीवन में मुठ्ठीभर संस्थाएं बची है जिनकी ओर अभी भी इज्जत से देखा जाता है और उसी इज्जत को तार-तार करने की यह शगल है। यह पहला मौका है, जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग की तैयारी हो रही है। इससे पहले उच्च अदालतों के दो जजों के खिलाफ महाभियोग लाया गया था, लेकिन उसे पास नहीं कराया जा सका।

हमेशा की तरह इस ध्वंसकार्य का नेतृत्व कांग्रेस पार्टी ही कर रही है, हालांकि इसके लिए उसके पास कोई पुख्ता वजह नहीं है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस प्रस्ताव पर विपक्ष के कई दलों के नेताओं ने हस्ताक्षर किए हैं। इन दलों में राकांपा, वामदल, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस भी शामिल हैं। कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोप न केवल बहुत महीन बल्कि बेजान भी है। कानून और नैतिकता की कसौटी पर वे एक पल भी नहीं ठहर सकते। चाहे सीजेआई ने विशेष न्यायाधीशों को मामले सौंपने के लिए अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया हो या नहीं अथवा उनमें से कुछ की सुनवाई खुद करना पसंद किया हो, यह महाभियोग का कारण नहीं हो सकता।

अपने राजनीतिक भविष्य से चिंतित इन दलों का सबसे बड़ा ऐतराज यह है, कि न्या. मिश्रा राजनीतिक रूप से संवेदनशील एक मामले की सुनवाई खुद कर रहे है। इसलिए उनके विरोधियों का बौखलाना स्वाभाविक है। लेकिन इससे उनके आरोपों को वजन मिलने का कोई कारण नहीं है। बल्कि सीजेआई ने किसी विशेष मामले को अपने पसंद की किसी दूसरी पीठ पर निर्दिष्ट करने के बजाय खुद सुना इस तरह का आरोप लगाकर ये लोग इसी तर्क को बल देते है, कि वह दूसरा बेंच इनके द्वारा फिक्स था। एक मेडिकल कॉलेज से जुड़े मामले में राहत देने में मुख्य न्यायाधीश शामिल थे, इस आरोप में भी कोई दम नहीं है।

इस महाभियोग के प्रस्तावकों का संपूर्ण ध्यान सरकार को शर्मिंदा करने के लिए न्यायपालिका का उपयोग करने पर है, जबकि राजनीतिक किचड़-उछाल के लिए न्यायपालिका का उपयोग न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए सीजेआई प्रयास कर रहे है। वैसे न्या. मिश्रा का रिकार्ड शानदार रहा है। वे उस पीठ का हिस्सा थे जिसने 16 दिसंबर को हुए सामूहिक बलात्कार मामले में चार दोषियों को मौत की सजा की पुष्टि की थी और सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान को अनिवार्य बनाने का आदेश पारित किया था। न्यायमूर्ति मिश्रा वर्तमान में उस पीठ की अध्यक्षता कर रहे हैं जो कावेरी तथा कृष्णा नदी जल विवाद, बीसीसीआई सुधार और सहारा मामले समेत कई अन्य मामलों की सुनवाई कर रही है। न्यायमूर्ति मिश्रा 2 अक्तूबर 2018 तक अपने पद पर सेवाएं देनेवाले है और विपक्ष चाहता है, कि इस दौरान राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई न हो। कपिल सिब्बल जैसे नेता तो भरी कोर्ट में कह चुके है, कि सन 2019 तक इस मामले को टाला जाएं। गलती से भी इस मामले का फैसला हिंदूओं के हक में हुआ, तो इसका फायदा भाजपा को होगा इसी ड़र से सभी सेकुलर पार्टियां सहमी हुई है।

स्पष्ट है, कि वे किसी भी तरह न्या. मिश्रा को इस मामले में आगे बढ़ने से रोकना चाहती है। महाभियोग का पैंतरा बस इसी भयतंत्र का एक हिस्सा है। बार काउंसिल के कुछ सदस्यों की कांग्रेसधर्मिता छिपी हुई नहीं है। सीजेआई मिश्रा अगर उनके इशारों पर चलने के लिए हामी भर देते, तो उन पर महाभियोग नहीं चलाया जाता। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने सरकारविरोधी रूख में एक सहभागी बनने हेतु सीजेआई को धमकाने के लिए संसद की उस शक्ति का दुरुपयोग किया जा रहा है जिसके तहत गलतियां करनेवाले न्यायाधीशों को सज़ा दी जाती है। उम्मीद है कि सीजेआई मिश्रा अपनी भूमिका पर कायम रहेंगे और इस तरह के ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेंगे।

Beyond Lingayat Hype, Something Else May Haunt Siddaramaiah

Even as political pundits are engaged in heated debate over what the possible impact of Chief Minister Siddaramaiah’s decision to accord separate status of religion to Lingayats in Karnataka would be, there is something else that may haunt him in the long run. And that is large number of farmer’s suicide in the state. Karnataka, one of the most naturally abundant states in India, is facing a severe crisis of droughts and weak agriculture. According to state’s own statistics department, as many as 3,515 farmers in Karnataka have committed suicide between April 2013 and November 2017. Of these, 2,525 suicides were due to drought and farm failure, as per the state agriculture department said.

According to a PTI report in December 2017, 3,515 farmers were reported to have committed suicide from April 2013 to November 2017; from April 2008 to April 2012, as many as 1,125 farmers were reported to have committed suicide.Out of the 3,515 suicide cases reported, the agriculture department accepted 2,525 cases as being due to drought and crop failure, the data said.

Agriculture Director B.Y. Srinivas told mediapersons that as many as 112 suicide cases were pending for the want of ratification by a state government panel since 2013. The highest number of suicides (1,483) were reported during 2015-16 and lowest (106) during 2013-14, Srinivas said. “Sugarcane growers top the list of suicides, followed by cotton and paddy cultivators,” and

“As many as 1,332 cases have been registered against money lenders, of which 585 have been arrested in last three years,” were the statements attributed to him.

The farmers who committed suicides included the cultivators of coconut, paddy, areca nut, cash crops and various others. It is just behind Maharashtra in terms of farmers in distress. The signs of this distress are evident even now through the numerous marches that have been taken out in various parts of the state during last few years. The Maharashtra is still in rough weather on resolving the agrarian crisis that has engulfed the state and dented the state’s image in a big way.

It is a common knowledge that the Siddaramaiah government has failed to address the farmers’ plight effectively. So obviously enough, the government is pushed to the corner over the issue. And hence, Siddaramaiah finds it necessary to conjure up issues that have more sentimental appeal than the practical one. Thus, imposition of Hindi and separate flag becomes more pertinent issue than the rising number of farmers’ suicides. Separate Lingayat religion becomes more important than the environmental degradation in cities like Bangalore.

The state government has faced flak for its utter failure in resolving many issues. Moreover, the pulbic opinion is largely becoming hostile to the government due to its failure in arresting the criminialisation of politics. And just ahead of the assembly elections, it has tried to divide Lingayats and Veerashaivas, also Lingayats and other communities, by announcing minority status for them. All this manuevering may bring headlines and mileage to the Congress, but it cannot ensure victory in the electoral fray.

हलकटपणाची हद्द!

अखेर विधानसभा निवडणुकीच्या ऐन तोंडावर कर्नाटकचे मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या यांनी लिंगायत हा धर्म असल्याचे जाहीर केले आहे. लिंगायत धर्मासंबंधी सरकारने नेमलेल्या न्या. नागमोहनदास समितीच्या शिफारशी मान्य करून हा निर्णय घेण्यात आला आहे. अर्थात एखाद्या समुदायाला स्वतंत्र धर्म म्हणून जाहीर करण्याचे अधिकार अद्याप तरी केंद्राकडे आहेत. त्यामुळे हा प्रस्ताव केंद्र सरकारकडे मंजुरीसाठी पाठविण्यात येणार आहे. केंद्राने तो स्वीकारला (ते शक्य नाही) तर सिद्धरामय्यांची चित आणि नाकारला (ही शक्यता जास्त) तर त्यांचाच पट!

लिंगायत हा धर्म असल्याचा विषय गेल्या काही महिन्यांपासून गॅसवर तापवत ठेवलाच होता. स्वतंत्र लिंगायत धर्माच्या मागणीसाठी कर्नाटक व महाराष्ट्रात मोर्चे निघाले होते. कर्नाटकातील काँग्रेस सरकारने लिंगायत समुदायाला केवळ स्वतंत्र धर्मच नव्हे, तर अल्पसंख्याक दर्जा देण्याचीही शिफारस केली आहे. दोन गटांमध्ये जातीय, प्रादेशिक किंवा धार्मिक वाद पेटविण्याची एक स्वतंत्र कला काँग्रेसने विकसित केली आहे.

गेल्या लोकसभा निवडणुकीच्या आधी 2013 साली काँग्रेसने अशाच प्रकारे आंध्र प्रदेश आणि तेलंगाणात पेटवापेटवी केली होती. त्याचे परिणाम आजही या दोन राज्यांना भोगावे लागत आहेत. त्याच्याही आधी सच्चर अहवालाच्या नावाखाली मुस्लिमांना उचकावण्याचे प्रयत्न झालेच होते. जातीय दंगली प्रतिबंधक कायद्याच्या विरोधात विधेयकाच्या नावाखालीही बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक अशा रीतीने झुंजविण्याचा डाव होताच. त्यातच आता राजकीय लाभासाठी ही नवी खेळी.

लिंगायत हा समुदाय कर्नाटकातील एकूण लोकसंख्येपैकी 17% असून तो मतदारांमध्ये सर्वात मोठा हिस्सा आहे. लिंगायत समुदायातील वीरेंद्र पाटील या मुख्यमंत्र्याला काँग्रेसने 1990 मध्ये अत्यंत मानहानीकारक पद्धतीने काढले होते (पक्षाच्या नेहमीच्या पद्धतीने). तेव्हापासून हा समुदाय काँग्रेसच्या बाजूला गेला, खासकरून उत्तर कर्नाटकमध्ये. काही काळ या समुदायाने रामकृष्ण हेगडे यांच्या नेतृत्वाखालील जनता परिवाराला साथ दिली आणि त्यानंतर भारतीय जनता पक्षाला. गेल्या अनेक निवडणुकांमध्ये या समुदायाने भाजपला साथ दिली. दहा वर्षांपूर्वी दक्षिण भारतात पहिल्यांदा कमळ उगविले होते त्यामागे याच समुदायाचा पाठिंबा होता, असे मानले जाते. येडियुराप्पा यांच्या रूपाने या समुदायातील एक व्यक्ती भाजपचे नेतृत्व करत आहे. भाजपची हीच पारंपरिक मते फोडण्यासाठी काँग्रेसने हा निर्णय घेतला आहे. तेही विधानसभा निवडणुकीला काही दिवस शिल्लक असताना!

अर्थात लिंगायत धर्म हाही काही एकजिनसी गट नाही. त्यात वीरशैव आणि लिंगायत असे दोन भाग आहेत आणि दोन्ही गटांमध्ये या मुद्द्यावर एकमत नाही. न्या. नागमोहनदास यांच्या समितीच्या अहवाल स्वीकारू नये. स्वतंत्र धर्म म्हणून मान्यता द्यायचीच असेल तर वीरशैव-लिंगायत असे नाव द्यावे, अशी मागनी वीरशैव गटाने केली होती. कालच्याच घोषणेनंतर गुलबर्गा येथील वल्लभभाई पटेल चौकात वीरशैव आणि लिंगायत समुदायातील कार्यकर्त्यांमध्ये तुंबळ हाणामारी झाली. लिंगायत धर्माला विरोध करून वीरशैव नेते आणि कार्यकर्त्यांनी घोषणबाजी केली. तेव्हा लिंगायत धर्मवादी कार्यकर्त्यांनी त्यांना विरोध केला आणि संघर्ष घडला.

या दोन गटांतील मतभेद दूर करण्यासाठी राज्य सरकारने लिंगायत धर्मात वीरशैव समुदायाचाही समावेश केला आहे. परंतु त्याचा फायदा होण्याची फारशी शक्यता नाही. कारण त्याच्या विरोधात आवाज वीरशैव गटानेच दिला आहे. ‘स्वतंत्र लिंगायत धर्माला मान्यता देण्याची शिफारस राज्य सरकारने केंद्राकडे केली आहे. समाजाला विभाजित करण्याचा प्रयत्न करणाऱ्यांविरुद्ध धर्मयुद्ध सुरू करावे लागेल,’ असे बाळेहान्नूर येथील रंभापुरि पीठाचे महाराज वीरसोमेश्वर शिवाचार्य स्वामीजी यांनी म्हटले आहे. वीरशैव-लिंगायत धर्मियांना विभाजित करणाऱ्या राजकारण्यांना (येथे काँग्रेस असे वाचावे) धडा शिकवण्याचे आवाहन त्यांनी मतदारांना केले आहे. “आमच्या धर्माचे विभाजन झाल्यास आम्ही न्यायालयात जाऊ,” असा इशाराही त्यांनी दिला आहे.

मुख्यमंत्रि सिद्धरामय्या यांनी वीरशैव व लिंगायत यांना स्वतंत्र धर्म जाहीर करण्यामागे छुपा अजेंडा असल्याचा आरोप माजी मुख्यमंत्री व धर्मनिरपेक्ष जनता दलाचे अध्यक्ष एच. डी. कुमारस्वामी यांनीही केला आहे. ‘समाजाला एकत्र करणे आणि चालवणे ही सरकारची जबाबदारी असते. धार्मिक विषय ठरविण्याचे काम धर्माधिकाऱ्यांचे असते. या मुद्द्यावरून आता संघर्ष सुरू होईल आणि त्याचे परिणाम मुख्यमंत्र्यांना भोगावे लागतील,’ असे त्यांनी म्हटले आहे.

थोडक्यात म्हणजे हिंदीविरोधा आंदोलनाला फूस देण्यापासून सुरू झालेला सिद्धरामय्या यांचा प्रवास आता थेट हिंदूंमध्ये फूट पाडण्यापर्यंत आला आहे. हलकटपणाची ही हद्द आहे. सत्तेसाठी केवढा हा अनाचार!

विकास गांडो थयो हतो, हवे एक्स्पोझ थयो छे…

Congress trump formulaही गोष्ट आहे गेल्या जुलै महिन्यातील. अमेरिकेत अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितीत डोनाल्ड ट्रम्प यांना अध्यक्षपद निवडणूक जिंकून देणाऱ्या चाणक्याने त्यावेळी भारताचा दौरा केला होता. या पाश्चिमात्य चाणक्याने त्यावेळी विरोधी पक्षातील अनेक नेत्यांच्या गाठीभेटी घेतल्या होत्या. मोदींना मात देण्यासाठी विरोधक या चाणक्याची मदत घेणार असल्याची दिल्लीत चर्चा होती.
अलेक्झांडर निक्स हे त्या चाणक्याचे नाव आणि हे निक्स कोण होते? तर आज डाटाचोरीच्या प्रकरणात जगभरात शेणफेकीला तोंड देत असलेल्या केम्ब्रिज अॅनालिटीका कंपनीचे मुख्य कार्यकारी अधिकारी. याच कंपनीने 2016 साली अध्यक्षीय निवडणुकीत डोनाल्ड ट्रम्प यांची प्रचार मोहीम राबविली होती. ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ हा लक्षवेधक नारा याच निक्स यांनी ट्रम्प यांच्यासाठी घडविला होता. निक्स हे केवळ 24 तासांसाठी भारतात येऊन गेले होते.
त्यावेळी दिल्लीत अशी चर्चा होती, की निक्स हे विरोधकांच्या वतीने 2019 मधील लोकसभा निवडणुकीत मोदी यांच्यावर मात करण्याची रणनीती तयार करतील. त्यासाठी निक्स यांनी विरोधकांतील काही नेत्यांच्या मुलाखतीही घेतल्याचे सांगितले जात होते. संयुक्त जनता दलाचे नेते के. सी. त्यागी यांचे चिरंजीव अंबरीश त्यागी हे निक्स यांच्या त्या टीममध्ये सामील होते. त्यावेळी त्यागी यांनी निक्स हे भारतात फक्त 24 तासांसाठी येऊन गेल्याचे नेटवर्क 18 वाहिनीला सांगितले होते. तसेच काही नेत्यांशी चर्चा झाल्याचेही त्यांनी मान्य केले होते. हे अंबरीश ट्रम्प यांच्या मोहिमेच्या टीमचा भाग होते आणि बिहार विधानसभा निवडणुकीत त्यांनी नीतीश कुमार यांच्या सोशल मीडिया मोहिमेचे काम सांभाळले होते.
त्यानंतर तीन-चार महिन्यांनंतर राहुल गांधी यांच्या ट्विटर खात्यावर त्यांच्या अनुयायांची संख्या अचानक वाढली होती. त्यावेळी रशिया आणि कझाकस्तानातून बोट्सद्वारे त्यांच्या ट्विट्सला रिट्वीट करण्यात येत असल्याचे उघड झाले होते. त्यानंतर गुजरात निवडणुकांच्या वेळेस अचानक काँग्रेसच्या सोशल मीडिया मोहिमेला मोठा प्रतिसाद मिळू लागला (किंवा खरे सांगायचे तर मोठा प्रतिसाद मिळत असल्याचे चित्र निर्माण करण्यात आले).
काल फेसबुक डाटाचोरीच्या प्रकरणातून भारतीय जनता पक्ष आणि काँग्रेसमध्ये जी लठमार होळी खेळल्या जात होती, ती पाहून हे सर्व धागेदोरे आपोआप आठवत गेले. अमेरिकेसहित ब्रिटन, केनिया, ब्राझील अशा देशांच्या निवडणुकांमध्ये 5 कोटी फेसबुक सदस्यांची गोपनीय माहिती चोरून मतदारांवर प्रभाव पाडण्याचा आरोप आता या केम्ब्रिज अॅनालिटीकावर लागत आहे.
या कंपनीची सेवा काँग्रेस घेणार असल्याची टीका भाजपने केली आहे, तर काँग्रेसने हा आरोप सपशेल नाकारला आहे. लोकशाही आणि फेसबुक वापरकर्त्यांच्या दृष्टीने भारत हा सर्वात मोठा देश आहे. भारतात फेसबुकचे 25 कोटी वापरकर्ते आहेत. त्यामुळे हा मुद्दा गंभीर आहे.
काँग्रेसने कितीही नाकारले तरी केम्ब्रिज अॅनालिटिका आणि पक्षाचा संबंध त्याला नाकारता येणार नाही. या कंपनीने राहुल गांधींची प्रतिमा उजळण्यासाठी किती पराकाष्ठा केली आहे, याचे गोडवे अगदी काही दिवसांपर्यंत प्रसारमाध्यमांनी गायले होते. काही जणांनी तर या कंपनीला काँग्रेसचे ब्रह्मास्त्र म्हटले होते.
शिवाय डाटाचोरीच्या संदर्भातील काँग्रेसवर हा काही पहिलाच आरोप नाही. राहुल गांधी यांनी नियुक्त केलेले चीफ ऑफ डेटा अॅनालेटिक्स प्रवीण चक्रवर्ती यांच्यावरदेखील डाटाचोरीचा आरोप आहे. चक्रवर्ती यांच्यावर त्यांच्या अमेरिकेतील माजी मालकाने म्हणजे थॉमस विझेल यांनी डाटाचोरीचा गुन्हा दाखल केला आहे, असे इकॉनॉमिक टाईम्सने म्हटले आहे.
इतकेच कशाला, केम्ब्रिज अॅनालिटिका आणि तिची भागीदार कंपनी ओव्हलेनो हिच्याशी आपला काही संबंध नाही, असे काँग्रेसने म्हटले आहे. परंतु हे तद्दन खोटे असून ओव्हलेनोचे मुख्य कार्यकारी अधिकारी 2011-12 या काळात माझ्या संपर्कात होते आणि मला काँग्रेसच्या वतीने तिला डाटा देण्यास सांगण्यात आले होते, असे काँग्रेसचे बंडखोर नेते शहजाद पूनावाला यांनी सांगितले आहे.
गुजरात निवडणुकांच्या आगेमागे विकास गांडो थयो छे हा हॅशटॅग अत्यंत लोकप्रिय झाला होता. त्यामागे कोणाचा हात होता, हे आता स्पष्ट व्हायला हरकत नाही. त्यामुळे असे म्हणायला हरकत नाही, की विकास गांडो थयो हतो, हवे एक्स्पोझ थयो छे… (विकास वेडा झाला होता, आता एक्स्पोझ झाला आहे).