नाकारों के नकारों पर सवार कांग्रेस

कहते हैं, कि जो लोग अपनी गलती से सीखते है वे साधारण होते है। जो दूसरों की गलतियों से सीखते है वे बुद्धिमान होते है लेकिन जो ना अपनी और ना दूसरों की गलतियों से सीखते है वे मूर्ख होते है। कांग्रेस पार्टी का हाल कुछ इस तीसरे वर्ग के लोगों जैसा है। अपनी पुरानी शिकस्तों और वर्तमान राजनीतिक सूझबूझ से वह कुछ भी सीखने के लिए तैयार नहीं है।
एक तरफ कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने की बात करती है जबकि अपने इस लक्ष्य के लिए दूसरी पार्टियों को साथ लेने के लिए वह तैयार नहीं है! सारे राजनीतिक विश्लेषक एक सूर में यह कहते हैं, कि कांग्रेस का अहंकार उसको डुबानेवाला है। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी में बिठाने के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ता इतने लालायित है कि उसके लिए पूरी तैयारी करने की भी तैयारी में नहीं दिखा रहे। जंग में जीतने का उनको इतना विश्वास है कि जंग की तैयारी करना वे ज़रूरी नहीं समझते।

शुक्रवार को कांग्रेस ने कहा कि पश्चिम बंगाल सहित जिन राज्यों में गठबंधन को लेकर प्रयास हो रहे हैं, वहां किसी तरह की समस्या नहीं है। पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने यह भी कहा, कि विपक्षी दलों का मकसद प्रधानमंत्री मोदी को हटाना नहीं बल्कि देश को बचाना है।

उन्होंने बताया कि, ‘‘हमारा मकसद मोदी जी को हटाना नहीं है। हमारा मकसद देश को बचाना है, संस्थाओं को बचाना है। सबकी स्वतंत्रता को बचाना है। जिस व्यक्ति विशेष को लेकर भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव को व्यक्तिवाद का चुनाव बनाना चाहती है, उस व्यक्ति में ही कोई विशेषता लोगों को नहीं दिखती, तो वो कैसा व्यक्ति विशेष है? ’’

खेड़ा ने कहा, ‘‘ये बड़ा स्पष्ट है कि जहां भी हमारी गठबंधन की बात चल रही है, जिन राज्यों में चल रही है, कहीं कोई समस्या नहीं है, बातचीत चल रही है, बातचीत में जितना समय लगता है, उतना लगता है।’’

इस पूरे कथन को पढ़ने के बाद दो बातें पूरी तरह से समझ आती है। एक तो कांग्रेस में नाकारे नेताओं की भरमार है जिनका अपना कोई जनाधार नहीं है। दूसरी बात यह, की ज़मीनी सच्चाई स्वीकार करने की मानसिकता इन नेताओं में अभी भी नहीं है। अगर भाजपा का प्रचार व्यक्ति विशेष (नरेंद्र मोदी) को केंद्र में रखकर है तो कांग्रेस कहां लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वाह कर रही है। बल्कि वहां तो पार्टी का पूरा खाका ही एक परिवार विशेष पर खड़ा है। मोदी ने 12 वर्ष गुजरात में और पांच वर्ष केंद्र में सरकार चलाते हुए अपना सिक्का चलाया है। तब जाकर भाजपा ने उन्हें अपना नेता बनाया है। राहुल गांधी ने अब तक किया क्या है जिसके बूते कांग्रेस उन्हें अपना मसीहा मानती है?

रही बात गठबंधन की, तो राजनीति पर थोड़ी सी भी नजर रखने वाले किसी भी निरीक्षक से पूछिए। वह आपको बताएगा कि कांग्रेस का गठबंधन का हर प्रयास विफल रहा है। पिछले वर्ष मई महीने में कर्नाटक में अधिक सीटें मिलने के बाद भी कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष जनता दल को मुख्यमंत्री पद देकर उदारता दिखाई थी। देश में मोदीविरोधी लगभग हर नेता उस अवसर पर उपस्थित था और तथाकथित सेकुलर दलों के नेताओं द्वारा उठाए गए हाथों की वह तस्वीर अभी भी लोगों के मन से हटी नहीं है। हालांकि उस तस्वीर से उभरी हुई आशाएं एक वर्ष के भीतर ही धूमिल हो चुकी है क्योंकि उस वक्त कांग्रेस ने जो सूझबूझ दिखाई थी आज उसका नामोनिशान तक दिखाई नहीं देता। इसी का कारण है, कि हर नेता, हर कुनबा, हर खेमा और हर पार्टी कांग्रेस से खफा है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कांग्रेस से गठबंधन करने में बिल्कुल रुचि नहीं रखती। बल्कि उन्होंने तो राज्य में सभी चुनाव क्षेत्रों के लिए अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल गठबंधन के लिए कांग्रेस से गुहार कर कर के थक गए लेकिन कांग्रेस ने उन्हें घास नहीं डाली। बिहार में अगर कांग्रेस राजद से गठबंधन कर भी लेती है तो भी उसका कितना असर होगा यह भगवान ही जाने क्योंकि राजद प्रमुख लालू यादव इस वक्त जेल में है। कर्नाटक में जिस गाजेबाजे के साथ कांग्रेस ने जेडीएस से गठबंधन किया था वह उत्साह नदारद है क्योंकि वहां जेडीएस अपने कुनबे में लगी आग को बुझाने में व्यस्त है। देवेगौडा परिवार अंदरूनी झगड़ों से परेशान है। ऊपर से पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की महत्वाकांक्षा इस गठबंधन को कमजोर करने में लगी हुई है। आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस से गठबंधन कर के तेलंगाना के विधानसभा चुनाव लड़े थे लेकिन वहां इस गठबंधन को मुंह की खानी पड़ी जिसके कारण नायडू भी कांग्रेस से नजदीकी बढ़ाने में ज्यादा रस लेते हुए नहीं दिखते। हालांकि तमिलनाडु में डीएमके के साथ हाथ मिलाने में कांग्रेस को थोड़ी बहुत सफलता मिली है और इसी सफलता पर पार्टी इतरा रही है।

एक पूरी पार्टी की पार्टी एक ही परिवार पर निर्भर हो और जनाधार रखने वाले नेताओं का अकाल हो तो वास्तविकता को नकारनेवाले नेताओं की तूती तो बोलेगी ही। ऐसे नकारों पर सवार कांग्रेस की नैया डूबना तय है।

आखिर चंद्राबाबू की मंशा क्या है?

narendra modi Chandrababu Naiduसरकार से निकलते हुए भी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में बने रहने की घोषणा करते हुए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू ने कहानी में ट्वीस्ट लाया है। भारतीय जनता पार्टी की एक दिशा में बढ़ती हुई यात्रा में उन्होंने एक मोड़ लाया है।

यह सर्वविदीत है, कि पिछले कई दिनों से भाजपा और तेलुगू देशम के बीच रिश्तों में खटास आई थी। एनडीए से बाहर निकलने की चंद्राबाबू गाहे-बगाहे कई बार घोषणा कर चुके थे। जनवरी में उन्होंने कहा था, ‘गठबंधन धर्म के कारण हम चुप हैं। यदि वे हमें नहीं चाहते तो हम नमस्कारम कह देंगे और अपनी राह पर निकल पड़ेंगे।’लेकिन उस पर पहल अभी तक नहीं हुई थी। बुधवार की रात 10 बजे के बाद उस पर अधिकारिक मुहर भी लग गई।

“मैंने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से 29 बार मुलाकात की लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया। जिस तरह से वे बात कर रहे हैं और कह रहे है, कि ‘हम इतना ही दे सकते है’ वह राज्य का अपमान है,” नायडू ने ताजा संवाददाता सम्मेलन में कहा।

हालांकि यह एक रटरटाया बयान है जिसका अभ्यास उनकी पार्टी वर्षों से कर रही है। तेलुगू आत्म-सम्मान का नारा तेदेपा के लिए एक सुपरीक्षित अस्त्र है जिसका प्रयोग कई बार किया गया है और वह भी सफलता के साथ। आखिर वह दिल्ली द्वारा आंध्र का अपमान किए जाने की दुहाई ही तो थी, जिसे देकर एन. टी. रामाराव हैद्राबाद की सत्ता पर आसीन हुए थे। इसी आघोष के साथ उन्होंने तेदेपा को जन्म दिया और सत्ता भी प्राप्त की। आज उसी जुमले को उछालकर चंद्राबाबू ने 1982-83 के चरित्र को दुहराने की कोशिश की है। फर्क इतना है, कि तब सत्ता में कांग्रेस थी और आज भाजपा है।

आंध्र प्रदेश और केंद्र के बीच विवाद का केवल एक कारण है और वह है एक शब्द : विशेष। इसका कारण है, कि आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना बनाते समय लोकसभा में बहस के दौरान तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की थी, कि नए आंध्र को वित्तीय समस्या के उबरने के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा (एससीएस) दिया जाएगा। मनमोहन सिंह ने यह घोषणा 5 वर्षों के लिए की थी, जबकि भाजपा ने सत्ता पाने की जद्दोजहद में 2014 में यह विशेष दर्जा एक दशक तक देने का वादा किया था। भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाले तेलुगु देसम के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती थी?

मगर आंध्र प्रदेश को विशिष्ट राज्य का दर्जा देने में मोदी मदद करेंगे, इसकी उम्मीद लगाए बैठे चंद्राबाबू के हाथ निराशा ही लगी थी। दोनों दलों के बीच अंतर इतना बढ़ गया, कि आखिर नायडू ने कहा, कि वे अपमानित महसूस कर रहे है।

आज एससीएस की स्थिति यह है, कि राजकीय क्षितिज पर उसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। भाजपा ने आंध्र को विशेष राज्य तो दूर, आम राज्यों की कतार में एक और राज्य से अधिक कुछ नहीं बनाया है। इसके लिए केंद्र ने 14 वें वित्त आयोग की सिफारिश को ढाल बनाया है जिसने एससीएस के खिलाफ सिफारिश की है। इसलिए विशेष वर्ग के नाम को छोड़कर उसके तहत मिलनेवाले सभी वित्तीय लाभ देने की बात केंद्र ने की है। इसका मतलब यह है, कि केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं का 90 प्रतिशत केंद्र द्वारा दिया जाएगा और राज्य द्वारा 10 प्रतिशत। आम तौर पर कुछ परियोजनाओं के खर्च का 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र द्वारा और 40 प्रतिशत राज्य द्वारा दिया जाता है।

केंद्र की इस पेशकश को चंद्राबाबू ने हामी भरी थी, क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं था। वास्तविकता यह है, कि चंद्राबाबू मोदी से ऐसा कुछ उगलवा नहीं पा रहे थे जैसा 1998-2004 के दौरान वे अटलबिहारी वाजपेयी से उगलवाते थे।

अब सवाल यह है, कि क्या तेदेपा का सरकार से बाहर निकलने से आंध्र का कुछ भला होगा? इसका उत्तर है, नहीं। खासकर तब अगर भाजपा 2019 में सत्ता में लौट आ जाए। दूसरी तरफ भाजपा और वाईएसआर कांग्रेस नेता जगनमोहन रेड्डी के बीच भी नजदीकियां बढ़ रही है। इसके कारण भी तेदेपा की भौंहें तन गई है। जगनमोहन रेड्डी की पिछले दिनों भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात ने इस बात को बल ही दिया है। जगनमोहन ने पहले भी कहा था और अब भी कहते है, कि अगर भाजपा आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देती है तो वो उसका समर्थन करेंगे। इसी बीच केंद्रीय जांच एजेंसियों के कई केस जगन पर चल रहे हैं। इन पचड़ों से खुद को बचाए रखने के लिए जगन भाजपा से हाथ मिलान चाहते हैं।

इसलिए भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलकर चंद्राबाबू शहीद बनना चाहते है। यह चंद्राबाबू का एक हथकंडा है जो एक तरह से भाजपा के खिलाफ नूरा कुश्ती है। राज्य में अपनी साख बचाने के लिए खेली गई यह चाल है। भाजपा को खलनायक बनाकर वे नायक बनना चाहते है जिससे आंध्र की सत्ता में उनका पुनरागमन सुकर हो। ऐसा हुआ, तो भाजपा और तेदेपा फिर से एक थाली में खाते हुए दिख सकते है।