EVM Hacking Drama – A Cheap Gimmick by Congress

The grand old party of India (which incidentally is only 49 years old and not 113-years, as if popularly believed) is kicking and shouting like a spoiled child after being out of power. Its latest salvo in the form of EVM hacking has backfired terribly, upsetting even its staunch supporters in media. More than bringing ridicule to the party through such cheap gimmicks, it has brought disrepute to the democratic institutions in the country.
The Election Commission was justified in asking Delhi Police to lodge FIR against the purported hacker identified as Syed Shuja.
The cyber expert, during an event in London, claimed that he was part of the EVM design team and he can hack the EVMs used in the elections in India. He also made some sensational claims alleging that Bharatiya Janata Party, Samajwadi Party and even Bahujan Samaj Party achieved success in elections through EVM tampering. The so called cyber expert, who had little antecedents to prove his credentials, had claimed that the 2014 Lok Sabha elections were rigged. And most explosive claim was that BJP leader and Union Minister Gopinath Munde was “killed” because he was aware of EVM hacking in 2014 general elections.
The self-proclaimed cyber expert’s claims had all the elements of creating a magnificent scandal in the country even as Lok Sabha elections are barely a couple of months away.
Luckily enough, the game was spoiled because of presence of former Union Minister Kapil Sibal. That gave away all clues of this being a Congress-sponsored drama. Sibal is a respected name in legal circles, but he does not enjoy a good reputation in politics. He was the one asking the Supreme Court to postpone hearing of Ram Mandir case till after 2019 polls.
Thus, he is seen as someone who leaves no stone unturned to achieve his goals. Defeating BJP, and especially Narendra Modi, is a dream for Rahul Gandhi-led Congress and Sibal, like every other darbari politics in his party, is hell-bent on realizing this dream. However, his physical presence made the matters extremely difficult for his ilk and his party. Congress was too swift in denouncing him and distanced itself from his involvement in the matter.
What was Sibal doing there and in what capacity was he present – these are the questions that will be asked repeatedly. The secular campers will have a hard time replying to these questions satisfactorily.
This is why he went back foot immediately and explained that he was present in his personal capacity. However, no leader with a stature such as Sibal will dare to attend such a highly repercussive event without the party’s approval. Moreover, the said hacked targeting all parties except Congress was another red flag in believing Sibal’s words.

As pointed by Union minister Ravi Shankar Prasad, the Indian Journalists’ Association, which organized the conference in London, is headed by Ashis Ray who is a “committed Congressman” and has been singing paeans in support of Congress president Rahul Gandhi. He is a regular contributor to Congress mouthpiece National Herald, campaigns for the Congress on social media and has often attacked Prime Minister Narendra Modi. Not only this, he had also organized Gandhi’s public event in London.
In such a scenario, a well-thought and potential weapon from Congress’s stead has gone in vain. The exercise was reduced to being a circus, a farce and a political stunt. This was supposed to be a press conference, yet Shuja did not offer any proof nor did he faced questions by the media. It was a really bad PR exercise.
It must be noted that EC had organized EVM hacking challenge about two years ago but no party or organization could prove anything. Maratha strongman Sharad Pawar’s Nationalist Congress Party was the only party that had shown interest in taking part in that challenge, but it failed miserably. Aam Admi Party and BSP were the parties at the forefront in levelling allegations of EVM tampering.
Therefore, the EC considers the EVM tampering as a closed chapter and rightly so. Congress has made a laughing stock by putting up theatrics in the name of democracy. It would be worthwhile it they spend their energies in building organization rather in indulging in cheap acts. If they do not stop and listen to conscience, they would probable require such flimsy excuses after defeat in ensuing elections.

यह कैसा है एका, जहां हर कोई अकेला

मुट्ठियां भींचते हुए और भौहें तनते हुए कांग्रेस तथा उसकी मिली जुली पार्टियों ने जिस विरोधी एकता की ललकार की थी, वह एक झटके में तार तार हो गई। और यह सब 3 महीने के भीतर! तथाकथित महागठबंधन का वजूद बनने से पहले ही बिखर गया! राज्यसभा में बहुमत होने के बावजूद विपक्षी दल उप सभापति पद के लिए अपने उम्मीदवार को जीता नहीं सके और वहीं यह भाजपा नीत एनडीए ने अपने झंडे गाड़ दिए। इससे विपक्षी एकता का जो शगूफा कुछ लोगों ने थोड़ा है वह खोखला है, इसका नजारा भी लोगों को हो गया।

इस चुनाव में संयुक्त जनता दल के हरिवंश नारायण सिंह को 125 और बी. के. हरिप्रसाद को 105 मत मिले। लोकसभा चुनाव में एक वर्ष से भी कम समय रहने के चलते यह चुनाव राजग और संप्रग दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

भाजपा ने राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए अपने सहयोगी हरिवंश को राज्यसभा उप सभापति पद के लिए मनोनीत किया। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के हरिप्रसाद को बड़े अंतर से हराया। हरिप्रसाद की राजनीतिक साख का अंदाजा इस बात से किया जा सकता है, कि पिछले 40 वर्षों के अपने राजनीतिक कैरियर में उन्होंने आज तक कोई चुनाव नहीं जीता है। कांग्रेस ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाकर अपनी फजीहत खुद की है। वैसे भी, राहुल गांधी के उदय के बाद पार्टी इसकी आदी हो चुकी है। खैर, अपना स्वतंत्र उम्मीदवार खड़ा करना देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए राजनीतिक चाल के रूप में समर्थनीय माना जा सकता है। लेकिन उस उम्मीदवार के लिए अन्य दलों से समर्थन मांगना किसके शान के खिलाफ था?

इस चुनाव में ऐसा भी मज़ेदार नजारा देखने को मिला कि कांग्रेस को नेस्तनाबूत करते हुए दिल्ली की सत्ता हथियानेवाली आम आदमी पार्टी उसको समर्थन देने के लिए मचल रही थी और कांग्रेस उससे किनारा करने की जद्दोजहद कर रही थी। इसी तरह सरकार का विरोध करनेवाली किसी भी पार्टी से तालमेल बिठाना कांग्रेसियों ने जरूरी नहीं समझा। महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी भाजपा को परास्त करने के लिए लालायित थी। लेकिन उसका समर्थन पाने के लिए भी कांग्रेस की ओर से कोई कोशिश नहीं की गई।


भाजपा की रणनीति

इसकी तुलना में, एनडीए नेतृत्व ने लगातार क्षेत्रीय दलों से संपर्क बनाए रखा। बीजू जनता दल जैसे जो क्षेत्रीय दल, जो एनडीए में नहीं है लेकिन जो घोर कांग्रेस विरोधी है, उन्हें पटाने में एनडीए नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। विजयी और पराजित उम्मीदवार के मतों में केवल बीस का अंतर देखते हुए बीजेडी के 9 मत कितने अहम होंगे, इसका अंदाजा किया जा सकता है।

इसका नतीजा जो होनेवाला था वह हुआ। जेडीयू के उम्मीदवार ने भारी विजय प्राप्त की और अब इसके लिए कांग्रेस किसी और को दोष नहीं दे सकती।

भाजपा ने अपना उम्मीदवार खड़ा ना करते हुए एक तीर से दो निशाने लगाए। एक तरफ तो जेडीयू के खफा होने की खबरों को उसने पूर्ण विराम दिया, वहीं गैर भाजपा दलों को सिंह के खाते में वोट डालने के लिए प्रेरित भी किया। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति को देखिए। तेलंगाना के इस सत्ताधारी दल ने कुछ ही महीने पहले तीसरे मोर्चे का आगाज किया था। टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव भाजपा विरोधी महागठबंधन की धुरी बनकर उभरे थे। लेकिन उसी टीआरएस ने अपना मत जेडीयू के पाले में डाल दिया। आंध्र प्रदेश के वाईएसआर कांग्रेस ने ना भाजपा को वोट दिया ना कांग्रेस को, बल्कि अनुपस्थित रहकर एनडीए की मदद की। हां, तेलुगू देशम पार्टी ने जरूर कांग्रेस को समर्थन दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस और टीडीपी में 2019 में गठबंधन होगा। कारण यह, की आंध्र में टीडीपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस है और आंध्र में कांग्रेस का संघटनात्मक आधार बहुत ही कम है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के अव्यवस्थित विभाजन को लेकर वहां के लोग कांग्रेस और यूपीए से अभी भी नाराज है। इसलिए उसके साथ रहना कोई नहीं चाहेगा। तमिलनाडु की सत्ताधारी अन्नाद्रमुक ने भी सरकार के साथ रहना पसंद किया। तमिलनाडु के वर्तमान नेतृत्वहीन परिदृश्य में वहां की पार्टी मोदी जैसे सशक्त नेता से दूरी कभी नहीं बनाएगी।

अकाली दल और शिवसेना जैसे नाराज चलनेवाले दलों से दिलमिलाई करने के लिए भी भाजपा ने इस मौके का फायदा उठाया। यानि वर्तमान दोस्तों को कायम रखते हुए वह नए दोस्तों की खरीदारी करती रही।

कुल मिलाकर कांग्रेस के पास तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, डीएमके, पीडीपी और वामपंथियों के वोट रहे। क्या यह सारे दल अगले चुनाव में कांग्रेस के साथ खड़े रहेंगे? क्या राहुल गांधी का नेतृत्व उन्हें रास आएगा? इस चुनाव ने दिखा दिया, कि अधिकांश क्षेत्रीय दल अवसरवादी है और जिस दिल के पास सत्ता स्थापना के अवसर अधिक है उसके साथ जाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। जिस तीसरे मोर्चे की डिंगे यह दल हांक रहे थे, और कांग्रेस उनके सुर में सुर मिला रही थी, वह बस दूर की कौड़ी है।

यहां कोई एका नहीं है बल्कि यहां हर कोई अकेला है।

भाजपला रजनीकांत मिळाला…कर्नाटकात!

भारतीय जनता पक्षाने तमिळनाडूत हातपाय पसरण्याचे जोरदार प्रयत्न चालवले आहेत. सुपरस्टार रजनीकांत यांना पक्षाने हाताशी धरले आहे. भाजपने मारलेल्या हवेमुळेच रजनीकांत यांची महत्त्वांकाक्षा जागृत झाली आणि म्हणूनच त्यांनी राजकारणात प्रवेश करण्याचा निर्णय घेतला आहे, अशी बोलवा आहे. अण्णा द्रमुकच्या सर्वेसर्वा जयललिता यांच्या जाण्यानंतर निर्माण झालेली पोकळी भरून काढण्याची भाजपची इच्छा आहे. निर्नायकी अण्णा द्रमुक आणि भाऊबंदकीत अडकलेला द्रमुक यांच्यातील फटीतून सत्तेपर्यंत जाण्याचा त्या पक्षाना मनसुबा आहे. त्यात रजनीकांत यांच्यासारखा मोहरा त्यांना दुसरा सापडणार नाही.
परंतु भाजपची ही स्वप्नपार्टी ऐन रंगात येत असतानाच कमल हासन नावाच्या गड्याने त्या दुधात मिठाचा खडा टाकला. सत्ताधारी अण्णा द्रमुकवर एकामागोमाग शरसंधान करत कमल हासननेही सिंहासनाच्या खेळाल शड्डू ठोकला. आता तीन-चार (किंबहुना जास्तच!) फळ्या झालेल्या अण्णा द्रमुक माणसाळवण्यासाठी भाजपला किती तोशीस पडली, हे भाजपला माहीत! शक्य तोवर रजनीकांतला पक्षात घ्यायचे आणि ते नाही जमले तर त्याला स्वतंत्र उभे करायचे आणि त्यातून द्रमुकला एका प्रतिस्पर्ध्यात गुंतवून ठेवायचे, इकडे आपण अण्णा द्रमुकशी युती करून त्यांच्या भरभक्कम संघटनेचा लाभ घ्यायचा, ही भाजपची शक्कशल होती. परंतु पडद्यावयर सकारात्मक व नकारात्मक अशा भूमिका लीलया करणाऱ्या कमल हासनने येथे नकारात्मक पात्र उभे केले. कमलने तेथे कमळाला नख लावले म्हटले तरी चालेल.
तमिळनाडूत उधळलेला भाजपचा मनसुबा कर्नाटकात मात्र पूरा होताना दिसतोय. तिथे आगलावू राजकारण करणाऱ्या सिद्धरामय्या यांच्या विरोधात ‘चकचकीत’ स्पर्धा उभी राहिली आहे. या स्पर्धेचा भाजपला कितपत फायदा होईल, हे काळच सांगेल. पण कर्नाटकातील तीन पायांच्या शर्यतीला त्यामुळे एक वेगळा आयाम मिळलाय, हे नक्की!
कन्नड नट उपेंद्र याने नुकताच राजकारणात प्रवेश करण्याचा आपला निर्णय जाहीर केला आहे. त्याच्या पक्षाचे नाव जाहीर झालेले नसले, तरी आपल्या सार्वजनिक कार्यासाठी ‘प्रजाकीय’ असा छान शब्द त्याने दिला आहे. त्याच्या या उपक्रमाला प्रतिसादही चांगला मिळाला आहे. ही घोषणा करताना थेट खाकी सदऱ्यात येऊन त्याने फिल्मी रंगही दिला. कुठल्याही कार्यालयाचा गणवेष असतो, तसा राजकारण्यालाही हवा, म्हणून मी खाकी सदरा घातल्याचे स्पष्टीकरण त्याने दिले आहे.
कर्नाटकात राजकारणातील नट-नट्या हा काही अप्रूपाचा विषय नाही. सुपरस्टार राजकुमार यांच्यापासून अनेक जणांनी हा मार्ग चोखाळला आहे. खुद्द सिद्धरामय्या यांच्या मंत्रिमंडळात अंबरीष आणि उमाश्री हे दोन मंत्री चित्रपट क्षेत्रातील होते. त्यातील अंबरीष यांनी आता काँग्रेसला रामराम केला आहे. याशिवाय रम्या (दिव्या स्पंदना) ही कांग्रेसची माजी खासदार व पक्षाच्या सोशल मीडियाची प्रमुख ही सुद्धा चित्रपट क्षेत्रातीलच आहे. मात्र स्वतंत्र पक्ष काढण्याची हिंमत आतापर्यंत कोणीही केली नव्हती. ती पुढील महिन्यात वयाची 50 वर्षे पूर्ण करणाऱ्या उपेंद्रने केली आहे.
कर्नाटकातील राजकारण म्हणजे कॉंग्रेस, भाजप आणि धर्मनिरपेक्ष जनता दल (जेडीएस) या तीन पायांची शर्यत झाले आहे. उपेंद्रचा प्रजाकीय आता त्या राजकारणाचा चौथा खांब बनणार का, याची उत्सुकता निर्माण झाली आहे. वास्तविक उपेंद्र भाजपमध्ये प्रवेश करणार असल्याच्या जोरदार चर्चा होत्या. अमित शाह यांचा नुकताच कर्नाटक दौरा झाला, त्याच मुहूर्तावर तो हातात कमळ घेईल अशी अपेक्षा होती. मात्र नवा पक्ष काढून त्याने या कथेला वेगळेच वळण दिले आहे. अमित शहा कर्नाटकाच्या दौऱ्यावर असतानाच उपेंद्रने आपला इरादा जाहीर केला, हे महत्त्वाचे. वास्तविक शहा यांच्या दौऱ्यातच उपेंद्र भाजपमध्ये प्रवेश करणार असल्याच्या चर्चा कर्नाटकात सुरू होत्या. पण कथेत नवीन वळण आले आणि त्यांनी वेगळी चूल मांडली.
आगामी विधानसभा निवडणुकीत आपला पक्ष उतरणार असून सर्व 224 मतदारसंघांमध्ये पक्ष उमेदवार उभे करणार आहे, असे त्यांनी जाहीर केले आहे. “विजय किंवा पराभव यांपैकी कशानेही मी निराश होणार नाही. मी कर्मावर विश्वास ठेवतो, ” असे भगवद्गीतेतील श्लो भगवद्गीतेतील श्लोक उद्धृत करून त्यांनी सांगितले. याचा अर्थ निव्वळ दुसऱ्यांची मते खाल्ली तरी त्यांना चालणार आहे. “मला टार्गॆट्‌ असे नाही, राजकारणात येणे एवडेच बस,“ असे त्याने उदयवाणी या वृत्तपत्राला सांगितले. आपल्या महाराष्ट्राप्रमाणेच ‘भारतक्के नरेंद्र, कर्नाटकक्के उपेंद्र’ ही घोषणाही फेसबुकवर दिसते.
थोडक्यात म्हणजे भाजपने तमिळनाडूसाठी लिहिलेल्या पटकथेचे चित्रीकरण कर्नाटकात होत आहे. तिथे रजनीकांतचे तळ्यात-मळ्यात संपत नसताना इकडे कर्नाटकात मात्र ती पटकथा प्रत्यक्षात उतरली आहे.