यह कैसा है एका, जहां हर कोई अकेला

मुट्ठियां भींचते हुए और भौहें तनते हुए कांग्रेस तथा उसकी मिली जुली पार्टियों ने जिस विरोधी एकता की ललकार की थी, वह एक झटके में तार तार हो गई। और यह सब 3 महीने के भीतर! तथाकथित महागठबंधन का वजूद बनने से पहले ही बिखर गया! राज्यसभा में बहुमत होने के बावजूद विपक्षी दल उप सभापति पद के लिए अपने उम्मीदवार को जीता नहीं सके और वहीं यह भाजपा नीत एनडीए ने अपने झंडे गाड़ दिए। इससे विपक्षी एकता का जो शगूफा कुछ लोगों ने थोड़ा है वह खोखला है, इसका नजारा भी लोगों को हो गया।

इस चुनाव में संयुक्त जनता दल के हरिवंश नारायण सिंह को 125 और बी. के. हरिप्रसाद को 105 मत मिले। लोकसभा चुनाव में एक वर्ष से भी कम समय रहने के चलते यह चुनाव राजग और संप्रग दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

भाजपा ने राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए अपने सहयोगी हरिवंश को राज्यसभा उप सभापति पद के लिए मनोनीत किया। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के हरिप्रसाद को बड़े अंतर से हराया। हरिप्रसाद की राजनीतिक साख का अंदाजा इस बात से किया जा सकता है, कि पिछले 40 वर्षों के अपने राजनीतिक कैरियर में उन्होंने आज तक कोई चुनाव नहीं जीता है। कांग्रेस ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाकर अपनी फजीहत खुद की है। वैसे भी, राहुल गांधी के उदय के बाद पार्टी इसकी आदी हो चुकी है। खैर, अपना स्वतंत्र उम्मीदवार खड़ा करना देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए राजनीतिक चाल के रूप में समर्थनीय माना जा सकता है। लेकिन उस उम्मीदवार के लिए अन्य दलों से समर्थन मांगना किसके शान के खिलाफ था?

इस चुनाव में ऐसा भी मज़ेदार नजारा देखने को मिला कि कांग्रेस को नेस्तनाबूत करते हुए दिल्ली की सत्ता हथियानेवाली आम आदमी पार्टी उसको समर्थन देने के लिए मचल रही थी और कांग्रेस उससे किनारा करने की जद्दोजहद कर रही थी। इसी तरह सरकार का विरोध करनेवाली किसी भी पार्टी से तालमेल बिठाना कांग्रेसियों ने जरूरी नहीं समझा। महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी भाजपा को परास्त करने के लिए लालायित थी। लेकिन उसका समर्थन पाने के लिए भी कांग्रेस की ओर से कोई कोशिश नहीं की गई।

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भाजपा की रणनीति

इसकी तुलना में, एनडीए नेतृत्व ने लगातार क्षेत्रीय दलों से संपर्क बनाए रखा। बीजू जनता दल जैसे जो क्षेत्रीय दल, जो एनडीए में नहीं है लेकिन जो घोर कांग्रेस विरोधी है, उन्हें पटाने में एनडीए नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। विजयी और पराजित उम्मीदवार के मतों में केवल बीस का अंतर देखते हुए बीजेडी के 9 मत कितने अहम होंगे, इसका अंदाजा किया जा सकता है।

इसका नतीजा जो होनेवाला था वह हुआ। जेडीयू के उम्मीदवार ने भारी विजय प्राप्त की और अब इसके लिए कांग्रेस किसी और को दोष नहीं दे सकती।

भाजपा ने अपना उम्मीदवार खड़ा ना करते हुए एक तीर से दो निशाने लगाए। एक तरफ तो जेडीयू के खफा होने की खबरों को उसने पूर्ण विराम दिया, वहीं गैर भाजपा दलों को सिंह के खाते में वोट डालने के लिए प्रेरित भी किया। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति को देखिए। तेलंगाना के इस सत्ताधारी दल ने कुछ ही महीने पहले तीसरे मोर्चे का आगाज किया था। टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव भाजपा विरोधी महागठबंधन की धुरी बनकर उभरे थे। लेकिन उसी टीआरएस ने अपना मत जेडीयू के पाले में डाल दिया। आंध्र प्रदेश के वाईएसआर कांग्रेस ने ना भाजपा को वोट दिया ना कांग्रेस को, बल्कि अनुपस्थित रहकर एनडीए की मदद की। हां, तेलुगू देशम पार्टी ने जरूर कांग्रेस को समर्थन दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस और टीडीपी में 2019 में गठबंधन होगा। कारण यह, की आंध्र में टीडीपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस है और आंध्र में कांग्रेस का संघटनात्मक आधार बहुत ही कम है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के अव्यवस्थित विभाजन को लेकर वहां के लोग कांग्रेस और यूपीए से अभी भी नाराज है। इसलिए उसके साथ रहना कोई नहीं चाहेगा। तमिलनाडु की सत्ताधारी अन्नाद्रमुक ने भी सरकार के साथ रहना पसंद किया। तमिलनाडु के वर्तमान नेतृत्वहीन परिदृश्य में वहां की पार्टी मोदी जैसे सशक्त नेता से दूरी कभी नहीं बनाएगी।

अकाली दल और शिवसेना जैसे नाराज चलनेवाले दलों से दिलमिलाई करने के लिए भी भाजपा ने इस मौके का फायदा उठाया। यानि वर्तमान दोस्तों को कायम रखते हुए वह नए दोस्तों की खरीदारी करती रही।

कुल मिलाकर कांग्रेस के पास तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, डीएमके, पीडीपी और वामपंथियों के वोट रहे। क्या यह सारे दल अगले चुनाव में कांग्रेस के साथ खड़े रहेंगे? क्या राहुल गांधी का नेतृत्व उन्हें रास आएगा? इस चुनाव ने दिखा दिया, कि अधिकांश क्षेत्रीय दल अवसरवादी है और जिस दिल के पास सत्ता स्थापना के अवसर अधिक है उसके साथ जाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। जिस तीसरे मोर्चे की डिंगे यह दल हांक रहे थे, और कांग्रेस उनके सुर में सुर मिला रही थी, वह बस दूर की कौड़ी है।

यहां कोई एका नहीं है बल्कि यहां हर कोई अकेला है।

नैया को डगमगा न देने की चुनौती

अविश्वास प्रस्ताव से पहले विरोधी खेमे में उत्साह की ऐसी बयार थी, कि मानो नरेंद्र मोदी और भाजपा का सफाया बस एक कदम दूरी पर है। सभी विरोधी दलों ने ऐसा माहौल बनाया था, कि सरकार के नाकों चने चबाने का समय आ गया। अपनी एकजुटता का स्वांग बनाने से लेकर बेसिर-पैर के आरोपों की झड़ी लगाने तक हर दल ने एक भीषण संघर्ष के लिए नगाड़े बजाने शुरू किए थे। लेकिन शुक्रवार को लोकसभा में जब अविश्वास प्रस्ताव आया और सभी नेताओं के भाषणों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जवाब देने के लिए उठे, तो यह सारा स्वांग फुर्र हो गया।

इस प्रस्ताव का नतीजा क्या होनेवाला है यह तो हर कोई जानता था, लेकिन जिस तरह वह धड़ाम से औंधे मुंह गिरा उसने सरकारी खेमे में नई ऊर्जा भरने का काम किया। छब्बे गए चौबे बनने, दुबे बनके वापस आए की कहावत को चरितार्थ करते हुए विरोधियों ने मोदी में विश्वास की गर्जना की थी और उनमें आत्मविश्वास भरकर लौट गए। जहां एक ओर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 126 मत पड़े वही सरकार के पक्ष में 325 मत पड़े, लगातार हुए उपचुनाव में जिस तरह से भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा था, उससे भाजपा के तेवर कुछ नर्म हुए थे। लेकिन बहुमत के इस विशाल अंतर ने उसे कठोर मुद्रा अख्तियार करने का मौका दे दिया। भाजपा नीत रालोआ के पास जितने सदस्य कागज पर है उससे कहीं ज्यादा मत उसे प्राप्त हुए।

भाजपा बुलेट ट्रेन में सवार करते हुए आगे निकल गई जबकि विपक्ष पैसेंजर गाड़ी में सिग्नल की राह देखता रहा। यूं भी कह सकते है कि विपक्षी एकता का बुलबुला बनने से पहले ही फूट गया। सरकार द्वारा विश्वास प्रस्ताव जीतने के बाद शेयर बाजार ने जिस तरह से उछाल ली उसे यही संदेशा लोगों तक गया, कि सरकार अभी भी अपने ट्रैक पर है।

यह बात सच है कि संसद की जिरह और चुनाव का रण इन दोनों में अंतर होता है। लेकिन संसद में सरकार को घेरकर चुनाव में मोदी को मात देने का विपक्ष का सपना आखिर सपना ही रह सकता है। इस दो दिवसीय चर्चा पर एक नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि मोदी को धूल चटाने के लिए विपक्ष को एक बड़े चमत्कार की जरूरत है। इसके लिए विपक्ष के पास अभी लगभग एक साल का समय है। मगर सोनिया गांधी से लेकर शरद पवार तक और राहुल गांधी से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक यह भूल नहीं सकते, कि जितना समय उनके पास है उतना ही समय नरेंद्र मोदी के भी पास है। अतः जो चमत्कार विपक्ष कराना चाहता है वही या उससे भी बड़ा चमत्कार नरेंद्र मोदी नामक जादूगर करवा सकता है।

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा बिल्कुल कोरी रही। विपक्ष की तरफ से गंभीर हमला करने में कोई भी सफल नहीं रहा। राहुल गांधी ने जोरदार कोशिश की, उन्होंने लड़ाई की मुद्रा भी अच्छी तरह अख्तियार की। ऐसा लगने लगा था, कि शायद विपक्षी बेंच पर बिताए हुए चार वर्षों ने उन्हें राजनीति के गुर सीखा दिए है। भाषण के अंत में नरेंद्र मोदी को उनके द्वारा गले लगाना भले ही राजनीतिक पैंतरे के रूप में उल्लेखित हो, लेकिन उसके बाद जिस तरह की आंख मिचोली उन्होंने की और पकड़े गए उससे उनका नौसिखियापन फिर से उजागर हुआ। अपने समर्थकों को निराश करने में राहुल गांधी ने बड़ी ही महारत हासिल की है।

सन 2012 से लेकर भारतीय राजनीति के लगभग सभी प्रमुख खिलाड़ियों ने नरेंद्र मोदी की वाक्पटुता से समझौता कर लिया है। आज की तारीख में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और जन सामान्य को संबोधित करने में जो विशेषज्ञता मोदी ने हासिल की है उसके आसपास भी कोई फटकता हुआ नहीं दिखता। उनके इसी कौशल का एक और नज़ारा लोकसभा में देखने को मिला।

विश्वास मत प्राप्त करनेवाले सरकार को विजय मिली और इस प्रस्ताव को लानेवालों को अपना कर्तव्य पूरा करने की संतुष्टि मिली। लेकिन सबसे ज्यादा फजीहत शिवसेना की हुई। शिवसेना की भूमिका क्या है यह आखिर तक कोई समझ नहीं पाया। भाजपा को समर्थन देने या उसका विरोध करने को लेकर पार्टी में असमंजस का माहौल रहा। नौबत यहां तक आई, की शिवसेना भाजपा को समर्थन दे रही है, उसका विरोध कर रही है या अनुपस्थित रहकर इज्जत बचा रही है इसकी सुध लेना भी लोगों ने छोड़ दिया। आगामी समय में इसका असर जरूर देखने को मिलने वाला है। बताया जाता है, कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने महाराष्ट्र में अकेले के दम पर लड़ने के लिए कार्यकर्ताओं को आदेश दिए हैं। “मजबूर ये हालात इधर भी है उधर भी,” यह पंक्ति अगर किसी पर आज फिट बैठती है तो वह भाजपा और शिवसेना है।

बीजू पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल (बीजेडी) ने राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए अविश्वास प्रस्ताव से किनारा कर लिया। कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखने वाले बीजेडी ने अब तक खुद को कई तूफानों से अलग रखा है। और इस मैच में, जिसका नतीजा पहले एक्शन से ही तय था, किसी का भी पक्ष लेना पार्टी ने मुनासिब नहीं समझा जो उसकी समझदारी का परिचायक है।

राजनीति में एक और मजबूर पार्टी है तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी अन्नाद्रमुक। लोकसभा में तीसरे नंबर के सदस्य जिस पार्टी के पास है उसकी भूमिका यूं तो महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन अन्नाद्रमुक आज नेतृत्व की कसौटी से गुजर रही है। उसका वजूद केंद्र की मोदी सरकार के रहमों करम पर कायम है। इसलिए उसका भाजपा के साथ जाना न किसी को खटक सकता है न आश्चर्यचकित कर सकता है। यह भी सही है, की अन्नाद्रमुक की घोर विरोधी द्रमुक कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाए हुए हैं और इसलिए वह उस खेमे में नहीं जा सकती।
कुल मिलाकर भाजपा की नैया अनुकूल हवाओं के सहारे आगे बढ़ रही है। तृणमूल कांग्रेस, धर्मनिरपेक्ष जनता दल (जेडीएस) और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी चंद प्रादेशिक पार्टियों को छोड़ दे तो उसके सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं है। सपा और बसपा अभी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के फिराक में है। जिस तेलुगू देशम पार्टी ने यह प्रस्ताव लाया था उसकी और उसके नेता चंद्रबाबू नायडू की विश्वसनीयता हमेशा संदेह के घेरे में रही है। कमोबेश वही हाल महाराष्ट्र में एनसीपी का है।
कांग्रेस पर तंज कसते हुए मोदी ने कहा था
“न मांझी न रहबर
न हक में हवाएं है,
कश्ती भी जर्जर
यह कैसा सफर है।”
मोदी के नेतृत्व में भाजपा की हालत बिल्कुल इसके विपरीत है। उसके सामने चुनौती है तो बस अपनी नैया को डगमगा न देने की।

जोकर के हाथों में लोकतंत्र की लूट

कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में एच. डी. कुमारस्वामी जब शपथ ग्रहण कर रहे थे उस समय पूरे देश के सभी गैर-मोदी दलों के नेता वहां एकत्र हुए थे। मंच पर ही एक दूसरे का हाथ थाम कर इन सब लोगों ने अपने एक होने का संकेत उनके समर्थकों को दिया। उस दृश्य ने बता दिया, कि पिछले 4 वर्षों से केंद्र तथा देश के अधिकांश राज्यों में जिस प्रकार से भाजपा का रोड रोलर चल रहा है उसका जोरदार जवाब देने की तैयारी विरोधियों ने की है।

इस शपथग्रहण समारोह में पांच राज्यों के मुख्यमंत्री उपस्थित थे। पश्चिम बंगाल में मुहर्रम के लिए दुर्गा पूजा पर पाबंदी लगानेवाली ममता बैनर्जी, आंध्र प्रदेश में तिरुपति देवस्थान पर ईसाई महिला की नियुक्ति करनेवाले चंद्रबाबू नायडू, तेलंगाना में मुस्लिमों को आरक्षण देने के लिए जिद पर अड़े हुए के. चंद्रशेखर राव, केरल में दूसरा अरबस्थान बनाने के लिए लालायित पिनराई विजयन और दिल्ली में नौटंकी को संस्थात्मक दर्जा दिलानेवाले अरविंद केजरीवाल ने इस मंच को चार चांद लगाए। चंद्रबाबू नायडू और चंद्रशेखर राव इनमें कितनी पटती है, यह सबको पता है लेकिन वे वहां हाजिर थे। इतना ही नहीं एक दूसरे के खून के प्यासे अखिलेश यादव और मायावती भी वहां हाजिर थे। अरविंद केजरीवाल को मानो तक सभी दलों ने जैसे अपने कुनबे से बाहर रखा था और उन्होंने भी भ्रष्टाचार निर्मूलन के पुरोधा के रूप में खुद को महिमामंडित किया था। लालू प्रसाद यादव के गले मिलकर भी उनका भ्रष्टाचार का पाखंड बदस्तूर जारी था। किसी समय कांग्रेस को जी भर कर कोसनेवाला यह भ्रष्टाचारविरोधी वीर वहां कांग्रेस की पंक्ति में बैठा था।

इस समारोह में जिन्होंने एक दूसरे का हाथ पकड़कर कांग्रेस का हाथ मजबूत करने का बीड़ा उठाया उन सब नेताओं के पास मिलकर आज की घड़ी में लोकसभा की 265 सीटें हैं। फिर भी इनमें महाराष्ट्र की शिवसेना नहीं थी। यह दीगर बात है, कि यह जमावड़ा एक दूसरे की कितनी मदद करता है, इसको लेकर आशंकाएं बरकरार है। इन्हें देखकर भाजपा नेताओं के माथे की रेखाएं बढ़ गई होगी इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। भाजप से नाराज रहे लोगों को अच्छा लगे इसलिए ये दोनों कुछ दिन के लिए चेहरे पर चिंता लेकर घूमेंगे भी।

भाजपा के विरोध में इस अभियान का शंखनाद करने के लिए सेकुलरों को कुमार स्वामी के राज्याभिषेक से बेहतर मुहूरत नहीं मिल सकता था। एक ओर पूर्ण बहुमत ना मिलने का मलाल भाजपा को सता रहा हो, बहुमत ना मिलने के कारण पद छोड़ने की आफत येदियुरप्पा पर आई हो, मोदी शाह के हाथों से लोकतंत्र की इज्जत बचा सके ऐसा रिसॉर्ट विरोधियों को हाल ही में मिला हो – संक्षिप्त में कहे तो भाजपा के
सारे घाव हरे हो ऐसे समय में यह शंखनाद किया गया।

पर इन सब लोगों को एकत्र लानेवाला शख्स कौन है? वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। सन 2014 के लोकसभा और उसके बाद के लगभग हर चुनाव में एक बात दिख चुकी है माहौल चाहे जैसा भी हो, एक बार मोदी के मैदान में उतरते ही सारा दृश्य बदल जाता है। कर्नाटक में भी भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिली लेकिन इनमें से अधिकांश सीटें मोदी के करिश्मे का नतीजा है। पार्टी के किसी भी अन्य नेताओं को मतदान से संवाद साधने में सफलता नहीं मिली। येदियुरप्पा प्रभावशाली नेता जरूर है लेकिन भाजपा को अकेले के बूते सत्ता तक ले जाने की ताकत उनमें नहीं है यह फिर एक बार फिर साबित हो गया। कर्नाटक में मोदी अकेले भाजपा को 100 के पार ले गए यह बात भाजपा के लिए वास्तव में चिंता की बात है।

अगले एक वर्ष में लोकसभा का चुनाव है और भाजपा के अलावा बाकी सारे दलों का एक ही मलाल है, कि उनके पास मोदी नहीं है! सीधे जनता से बात करने वाला और उनके मत खींचने वाला चेहरा उनके पास नहीं है। फिर अपने अस्तित्व की आशंका से भयभीत विरोधियों के मन में एक बात ने पैठ जमा ली है, कि मोदी और भाजपा को टक्कर देने हो तो सभी भाजपा विरोधी दलों को एकत्र आना ही होगा। फुलपुर आदि उपचुनावों के नतीजों ने उनके मुगालते को और हवा दी है, हालांकि बड़े चुनावों के नतीजे कुछ और ही कहते हैं।

मजे की बात यह, कि जिस कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण के लिए ये लोग इकट्ठा हुए थे वह कहां एकत्रित विरोधियों के दम पर चुनकर आए थे। कर्नाटक में कांग्रेस और जीडीएस ने चुनाव सिर्फ अलग-अलग नहीं लढ़ा, बल्कि एक दूसरे पर आग उगलते हुए लड़ा था। लेकिन मतदाताओं का जनादेश खंडित रूप से आया और हताश कांग्रेस ने उत्साहित जीडीएस को तश्तरी में रखकर सत्ता सौंप दी।

विधान सौध के सीढ़ियों पर बने मंच पर आसीन इन नेताओं के मन में क्या विचार आते होंगे? पिछले तीन दशकों से देश की राजनीति कितनी अच्छी चल रही थी? प्रादेशिक दलों का जोर बढ़ रहा था, जिसके पास 5-10 विधायक या 15-20 सांसद हो वह नेता भी राज्य के मुख्यमंत्री या केंद्र में प्रधानमंत्री को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता था! सिर्फ अपनी जाति की गठरी संभलने की बात थी! कईयों के पोतो-पड़पोतों का का भी इंतज़ाम हो जाता था! कोई जेल में जाते समय अपनी बीवी को मुख्यमंत्री करता था, कोई रातोंरात इस दल से उस दल में जाता था या स्वाभिमान का दम देकर मंत्री पद हासिल करता था। इस पूरे तंत्र पर एक प्रहार किया मोदी नाम के व्यक्ति ने। दुष्ट व्यक्ति के विरोध में एकत्र आना ही होगा। लोकतंत्र बचाना ही होगा। मोदी नामक राक्षस को हराना ही है, ऐसा निश्चय उन्होंने किया होगा।

बैटमैन सीरीज की फिल्मों में से एक ‘डार्क नाइट राइज़ेस’ में आरंभ का एक दृश्य है। विलेन जोकर कई लोगों को साथ में लेकर बैंक पर डकैती डालने जाता है। उस समय सभी लोग जोकर के मुखोटे पहने हुए ही होते हैं। बैंक में प्रवेश करने के बाद ये लोग पहले वहां के लोगों को और कर्मचारियों को गोलियों से भूनते हैं। बाद में जैसे-जैसे रकम हाथ में आने लगती है वैसे वैसे ये सारे जोकर एक दूसरे को मारने लगते हैं। सबसे आखिर में पूरी रकम हाथ में हथियाने वाला जोकर (हीथ लेजर) हाथ आई लूट को लेकर भाग जाता है।

भारतीय लोकतंत्र की लूट ऐसे किसी जोकर के हाथ में ना पड़े तो गनीमत है।

जोकरच्या हाती लोकशाहीची लूट

कर्नाटकचे नवीन मुख्यमंत्री म्हणून हरदनहळ्ळी देवेगौडा कुमारस्वामी हे शपथग्रहण करत होते त्यावेळी देशभरातील सर्व मोदीरहीत पक्षांची मंडळी तिथे एकत्र जमली होती. व्यासपीठावरच मानवी साखळी उभी करून या सर्वांनी आपण एकत्र येणार असल्याचे आपापल्या अनुयायांना संकेत दिले. गेली चार वर्षे केंद्र तसेच देशाच्या बहुतेक राज्यांमध्ये ज्या प्रकारे भाजपचा मोदीछाप रोडरोलर फिरत आहे, त्याला एक खमके उत्तर देण्याची तयारी विरोधकांनी केली आहे.

या शपथविधी समारंभात पाच राज्यांचे मुख्यमंत्री हजर होते. पश्चिम बंगालमध्ये मोहरमसाठी दुर्गोत्सवाच्या मिरवणुकीवर बंदी घालणाऱ्या ममता बॅनर्जी, आंध्र प्रदेशात तिरुपती देवस्थानावर ख्रिस्ती महिलेची नियुक्ती करणारे चंद्राबाबु नायडू, तेलंगाणात मुस्लिमांना आरक्षण देण्यासाठी इरेला पेटलेले चंद्रशेखर राव, केरळमध्ये प्रति-अरबस्थान निर्माण करण्याचा विडा उचललेले पिनराई विजयन आणि दिल्लीत नौटंकीला संस्थात्मक स्वरूप प्राप्त करून देणारे अरविंद केजरीवाल यांनी या व्यासपीठाला शोभा आणली होती. चंद्राबाबु नायडू आणि तेलंगाणाचे चंद्रशेखर राव यांचे सख्य जगजाहीर आहे. पण ते तिथे हजर होते. इतकेच कशाला, एकमेकांचे हाडवैरी असलेले अखिलेश यादव आणि मायावती हेही तिथे हजर होते. अरविंद केजरीवाल यांना आजवर सर्व राजकीय पक्षांनी काहीसे गावकुसाबाहेर ठेवलेले आणि त्यांनीही भ्रष्टाचारनिर्मूलन शिरोमणी या नात्याने आपले सोवळे टिकवून ठेवले होते. अगदी लालूप्रसादांना मिठी मारल्यानंतरही त्यांचा हा भ्रष्टाचारनिर्मूलनाचा दंभ गेलेला नव्हता. एकेकाळी काँग्रेसला करकचून शिव्या घालणारा हा शुद्धीबहाद्दर तिथे काँग्रेसच्या पंक्तीत मानाने बसला होता.
या समारंभात ज्यांनी एकमेकांचा हात धरून काँग्रेसचा हात मजबूत करण्याचा प्रण केला, त्या सर्व नेत्यांकडे मिळून आजच्या घडीला लोकसभेच्या 265 जागा आहेत. तरीही यात महाराष्ट्रातील ‘सत्तारोधी’ शिवसेना नव्हतीच. हा गोतावळा आता एकमेकांना किती मदत करतो, हे येणारा काळच ठरवेल. बिनभाजपी नेत्यांची ही गर्दी पाहून मोदी-शहा आणि भाजपी नेत्यांच्या कपाळावर आठ्या उमटल्या असतील तर त्यात नवल नाही. भाजपवर खप्पामर्जी असलेल्यांना बरे वाटावे म्हणून ही जोडगोळी काही दिवस चेहऱ्यावर चिंता मिरवतीलही.

भाजपविरोधातील या मोहिमेचा शंखनाद करण्यासाठी सेक्युलरांना कुमारस्वामीच्या राज्याभिषेकापेक्षा आणखी चांगला मुहूर्त शोधूनही सापडला नसता. पूर्ण बहुमत न मिळाल्याची खंत भाजपला भंडावणारी. येडियुरप्पांना बहुमत न मिळाल्यामुळे पद सोडण्याची नामुष्की आलेली. मोदी-शहांच्या हातून लोकशाहीची अब्रू वाचवू शकेल असा रिसॉर्ट विरोधकांना नुकताच सापडलेला. थोडक्यात म्हणजे भाजपच्या सर्व जखमा ताज्या-ताज्या असतानाच हा शंखनाद करण्यात आला.

पण मुळात विळ्या-भोपळ्यांची ही मोट घालणारा मूळ शेतकरी कोण आहे? तो आहे पंतप्रधान नरेंद्र मोदी. वर्ष २०१४ची लोकसभा आणि त्यानंतरच्या जवळपास प्रत्येक निवडणुकीत एक गोष्ट दिसून आलीय, की वातावरण भले कसेही असो, मोदी एकदा रणांगणात उतरले की संपूर्ण चित्र बदलून जाते. अगदी कर्नाटकातही भाजपला सर्वात जास्त मिळाल्या, परंतु त्यातील बहुतेक जागा या मोदींच्या करिष्म्याचा परिणाम आहे. पक्षाच्या अन्य कुठल्याही नेत्याला मतदारांशी तसा संवाद साधता आलेला नाही. येडियुरप्पा हे प्रभावशाली नेते जरूर आहेत, परंतु एकहाती भाजपला सत्तेपर्यंत नेण्याचे सामर्थ्य त्यांच्यात नाही, हे पुनः पुनः सिद्ध झाले आहे. मोदींनी एकट्याने भाजपला शंभरीपार नेले ही भाजपसाठी खरे तर चिंतेची बाब आहे.

येत्या एक वर्षात लोकसभेची निवडणूक आहे आणि भाजपशिवाय झाडून साऱ्या पक्षांचे एकच दुखणे आहे – त्यांच्याकडे मोदी नाही! थेट जनतेशी संवाद साधणारा आणि त्यांची मते मिळवू शकेल, असा चेहरा त्यांच्याकडे नाही. मग अस्तित्वाचा प्रश्न भेडसावणाऱ्या विरोधकांनी मनाशी एक गोष्ट ठरवून टाकलीय – मोदी आणि भाजपला टक्कर द्यायची असेल तर भाजपविरोधी सर्व पक्षांनी एक यायला पाहिजे. फुलपूर इत्यादी ठिकाणच्या पोटनिवडणुकांनी त्यांच्या या समजाला खतपाणी घातलेय – अर्थात मोठ्या निवडणुकांच्या फलिताचे इंगित काही वेगळेच आहे. गंमत म्हणजे ज्या कुमारस्वामींच्या शपथविधीसाठी ते जमले होते ते तरी कुठे एकत्रित विरोधकांच्या जीवावर निवडून आले होते? कर्नाटकात काँग्रेस आणि धर्मनिरपेक्ष जनता दलाने निवडणूक वेगवेगळीच लढली नव्हती तर एकमेकांवर आग ओकत लढली होती. पण मतदारांचा जनादेश खंडीत आला आणि कातावलेल्या काँग्रेसने हरखलेल्या जेडीएसला सत्तेचे आवतण दिले.

विधानसौधाच्या पायऱ्यांवर व्यासपीठावर बसलेल्या या सगळ्या मंडळींच्या मनात काय असेल? गेली तीन दशके देशातील राजकारण किती छान चालू होते. प्रादेशिक पक्षांचा जोर वाढत होता. ज्याच्याकडे 5-10 आमदार किंवा 15-20 खासदार तो नेतासुद्धा राज्यात मुख्यमंत्र्याला आणि केंद्रात पंतप्रधानाला नाकदुऱ्या काढायला लावत होता. आपापल्या जातीचे गठ्ठे एकत्र केले, की झाले! अनेकांची नातवा-पतवंडांपर्यंतची नेतृत्वाची सोय व्हायची. कोणी तुरुंगात जाताना आपल्या बायकोला मुख्यमंत्री करायचा, कोणी रातोरात या पक्षातून त्या पक्षात जायचा. कोणी स्वाभिमानाच्या बेडकुळ्या काढून वट्ट मंत्रिपदे मिळवायचा. त्या सर्वांवर घाला घातला तो या मोदी नावाच्या माणसाने.

अशा या दुष्ट माणसाच्या विरोधात एकत्र यायलाच पाहिजे. लोकशाही वाचली पाहिजे. “लोकशाही ही ऊवांना मिळालेली सिंहाला खाण्याची शक्ती असते,” असे जॉर्ज क्लेमेंच्यू या लेखकाने म्हटले आहे. आपल्याला मिळतील तिथून उवा-पिसवा गोळा करू आणि मोदी नावाच्या राक्षसाला हटवू, असा निश्चयच त्यांनी केला असेल.

बॅटमन मालिकेच्या एका चित्रपटात (बहुतेक डार्क नाईट रायझेस) सुरूवातीचे दृश्य होते. खलनायक जोकर हा अनेकांना घेऊन बँकेवर दरोडा घालायला जातो. त्यावेळी सर्वांनी जोकरचेच मुखवटे घातलेले असतात. बँकेत शिरल्यावर ही मंडळी आधी तेथील लोकांना व कर्मचाऱ्यांना गोळ्या घालतात. नंतर जसजशी रक्कम हातात येऊ लागते तस तसे हे सर्व जोकर एकेकाला गोळ्या घालायला लागतात. सर्वात शेवटी संपूर्ण रक्कम एकहाती मिळालेला जोकर (हीथ लेजर) मिळालेली लूट घेऊन पोबारा करतो.

भारतीय लोकशाहीची लूट अशा जोकरच्या हाती पडण्याची वेळ येऊ नये म्हणजे मिळविली.

आखिर चंद्राबाबू की मंशा क्या है?

narendra modi Chandrababu Naiduसरकार से निकलते हुए भी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में बने रहने की घोषणा करते हुए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू ने कहानी में ट्वीस्ट लाया है। भारतीय जनता पार्टी की एक दिशा में बढ़ती हुई यात्रा में उन्होंने एक मोड़ लाया है।

यह सर्वविदीत है, कि पिछले कई दिनों से भाजपा और तेलुगू देशम के बीच रिश्तों में खटास आई थी। एनडीए से बाहर निकलने की चंद्राबाबू गाहे-बगाहे कई बार घोषणा कर चुके थे। जनवरी में उन्होंने कहा था, ‘गठबंधन धर्म के कारण हम चुप हैं। यदि वे हमें नहीं चाहते तो हम नमस्कारम कह देंगे और अपनी राह पर निकल पड़ेंगे।’लेकिन उस पर पहल अभी तक नहीं हुई थी। बुधवार की रात 10 बजे के बाद उस पर अधिकारिक मुहर भी लग गई।

“मैंने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से 29 बार मुलाकात की लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया। जिस तरह से वे बात कर रहे हैं और कह रहे है, कि ‘हम इतना ही दे सकते है’ वह राज्य का अपमान है,” नायडू ने ताजा संवाददाता सम्मेलन में कहा।

हालांकि यह एक रटरटाया बयान है जिसका अभ्यास उनकी पार्टी वर्षों से कर रही है। तेलुगू आत्म-सम्मान का नारा तेदेपा के लिए एक सुपरीक्षित अस्त्र है जिसका प्रयोग कई बार किया गया है और वह भी सफलता के साथ। आखिर वह दिल्ली द्वारा आंध्र का अपमान किए जाने की दुहाई ही तो थी, जिसे देकर एन. टी. रामाराव हैद्राबाद की सत्ता पर आसीन हुए थे। इसी आघोष के साथ उन्होंने तेदेपा को जन्म दिया और सत्ता भी प्राप्त की। आज उसी जुमले को उछालकर चंद्राबाबू ने 1982-83 के चरित्र को दुहराने की कोशिश की है। फर्क इतना है, कि तब सत्ता में कांग्रेस थी और आज भाजपा है।

आंध्र प्रदेश और केंद्र के बीच विवाद का केवल एक कारण है और वह है एक शब्द : विशेष। इसका कारण है, कि आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना बनाते समय लोकसभा में बहस के दौरान तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की थी, कि नए आंध्र को वित्तीय समस्या के उबरने के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा (एससीएस) दिया जाएगा। मनमोहन सिंह ने यह घोषणा 5 वर्षों के लिए की थी, जबकि भाजपा ने सत्ता पाने की जद्दोजहद में 2014 में यह विशेष दर्जा एक दशक तक देने का वादा किया था। भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाले तेलुगु देसम के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती थी?

मगर आंध्र प्रदेश को विशिष्ट राज्य का दर्जा देने में मोदी मदद करेंगे, इसकी उम्मीद लगाए बैठे चंद्राबाबू के हाथ निराशा ही लगी थी। दोनों दलों के बीच अंतर इतना बढ़ गया, कि आखिर नायडू ने कहा, कि वे अपमानित महसूस कर रहे है।

आज एससीएस की स्थिति यह है, कि राजकीय क्षितिज पर उसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। भाजपा ने आंध्र को विशेष राज्य तो दूर, आम राज्यों की कतार में एक और राज्य से अधिक कुछ नहीं बनाया है। इसके लिए केंद्र ने 14 वें वित्त आयोग की सिफारिश को ढाल बनाया है जिसने एससीएस के खिलाफ सिफारिश की है। इसलिए विशेष वर्ग के नाम को छोड़कर उसके तहत मिलनेवाले सभी वित्तीय लाभ देने की बात केंद्र ने की है। इसका मतलब यह है, कि केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं का 90 प्रतिशत केंद्र द्वारा दिया जाएगा और राज्य द्वारा 10 प्रतिशत। आम तौर पर कुछ परियोजनाओं के खर्च का 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र द्वारा और 40 प्रतिशत राज्य द्वारा दिया जाता है।

केंद्र की इस पेशकश को चंद्राबाबू ने हामी भरी थी, क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं था। वास्तविकता यह है, कि चंद्राबाबू मोदी से ऐसा कुछ उगलवा नहीं पा रहे थे जैसा 1998-2004 के दौरान वे अटलबिहारी वाजपेयी से उगलवाते थे।

अब सवाल यह है, कि क्या तेदेपा का सरकार से बाहर निकलने से आंध्र का कुछ भला होगा? इसका उत्तर है, नहीं। खासकर तब अगर भाजपा 2019 में सत्ता में लौट आ जाए। दूसरी तरफ भाजपा और वाईएसआर कांग्रेस नेता जगनमोहन रेड्डी के बीच भी नजदीकियां बढ़ रही है। इसके कारण भी तेदेपा की भौंहें तन गई है। जगनमोहन रेड्डी की पिछले दिनों भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात ने इस बात को बल ही दिया है। जगनमोहन ने पहले भी कहा था और अब भी कहते है, कि अगर भाजपा आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देती है तो वो उसका समर्थन करेंगे। इसी बीच केंद्रीय जांच एजेंसियों के कई केस जगन पर चल रहे हैं। इन पचड़ों से खुद को बचाए रखने के लिए जगन भाजपा से हाथ मिलान चाहते हैं।

इसलिए भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलकर चंद्राबाबू शहीद बनना चाहते है। यह चंद्राबाबू का एक हथकंडा है जो एक तरह से भाजपा के खिलाफ नूरा कुश्ती है। राज्य में अपनी साख बचाने के लिए खेली गई यह चाल है। भाजपा को खलनायक बनाकर वे नायक बनना चाहते है जिससे आंध्र की सत्ता में उनका पुनरागमन सुकर हो। ऐसा हुआ, तो भाजपा और तेदेपा फिर से एक थाली में खाते हुए दिख सकते है।

लिलिपुटांच्या गराड्यातील सिंदबाद

पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांनी लोकसभा आणि राज्यसभेत केलेल्या भाषणाच्या वेळेस ज्या प्रकारचे वातावरण होते, त्यावरून लोकशाहीच्या नावाने गळे काढणाऱ्यांची तोंडे आपसूकच बंद व्हायला हवी. एखादा पंतप्रधान राष्ट्रपतीच्या अभिभाषणावरील धन्यवाद प्रस्तावाला उत्तर देताना बोलत असेल तेव्हा विरोधकांनी गदारोळ करावा, हे दृश्य तसे दुर्मिळच. पण काल हेच घडले आणि तेही संसदेच्या दोन्ही सभागृहांत.काहीही करा, पण सभागृह चालू देऊच नका असा जणू या खासदारांना त्यांच्या धुरिणांनी आदेशच दिला असावा. म्हणायला ती संसदेची सभागृहे होती, पण तेथील एकूण प्रकार कुठल्याही प्रकारे संसदीय नव्हता. सत्ताधाऱ्यांपेक्षा विरोधकांनाच पुढल्या निवडणुकीची चिंता लागल्याचे ते लक्षण होते.

दुसरीकडे मोदींनी ज्या प्रकारे विरोधकांवर, खासकरून काँग्रेसवर, हल्ला चढविला त्यातून हेही स्पष्ट झाले, की जशास तसे उत्तर देण्याची आजही त्यांच्याकडे धमक आहे. विरोधकांनी नको तिथे आक्रमक होण्याचा प्रयत्न केला, तर सरकार त्यांना त्यांच्याच भाषेत उत्तर देईल, हे त्यांनी दाखवून दिले. पंतप्रधानांचे भाषण चालू असताना विरोधक गिल्ला करत असताना सिंदबादच्या (गुलिव्हर) सफरींमधील लिलिपुटच्या घोळक्यात उभ्या असलेल्या सिंदबादची आठवण होत होती. लिलिपुट हा खुज्या सरासरी उंची सुमारे सहा इंच असलेल्या माणसांचा समाज. मात्र त्यांचा अभिमान आणि अहंकार हा सामान्य माणसांएवढाच असतो. ते सामान्यत: लोभी, द्वेषपूर्ण, कारस्थानी, हिंसक, स्वार्थी आणि अविश्वसनीय असतात. त्यांच्यात सिंदबाद हा सामान्य माणूस राक्षसाएवढा उंच दिसतो.

संसदेचे कामकाज व्हावे, ही सत्ताधाऱ्यांची जबाबदारी आहे हे खरेच. पण कामकाज होऊच द्यायचे नाही, हे विरोधकांनी ठरविले तर ब्रह्मदेवही कामकाज चालवू शकणार नाही, हेही खरे. फिदायिन अतिरेक्यांप्रमाणे संसदेच्या कामात व्यत्यय आणण्यासाठी कटिबद्ध झालेल्या खासदारांवर कारवाई तरी काय करणार? अन् केली तरी व्हिक्टिम-व्हिक्टिम खेळण्यास, फॅसिझम वाढल्याचा कांगावा करण्यास ते मोकळेच!

एक तर प्रत्येक भाषण निवडणुकीचे भाषण म्हणून करण्यात मोदींचा हात कोणी धरू शकत नाही. त्यात त्यांनी काँग्रेसचे पुरते वस्त्रहरण केले. राज्यसभेत पंतप्रधान म्हणाले की, ‘ग्रामपंचायतीपासून संसदेपर्यंत अनेक वर्षे सत्ता काँग्रेसकडे होती. मात्र, त्याचे सारे श्रेय एका कुटुंबालाच दिल्याने तो पक्ष आज विरोधी बाकांवर आहे. यंग इंडियाचे स्वप्न स्वामी विवेकानंदांनीही पाहिले होते. विरोधकांना न्यू इंडिया नको असेल, तर ठीक आहे, मलाही गांधींचा भारत हवा आहे, पण काँग्रेसमुक्त भारत ही काही माझी कल्पना नव्हती. स्वातंत्र्य मिळाल्यावर गांधींनीच तशी इच्छा व्यक्त केली होती. आता देशाने ठरवावे की, त्यांना कोणता भारत हवाय,’ असे म्हणून त्यांनी चार अधिकचे गुण मिळविले. खरगेंना चिमटा काढण्याच्या ओघात महात्मा बसवेश्वरांचा दाखला देऊन त्यांनी कर्नाटकातील लिंगायत मतदारांनाही डोळा मारला.

एकाच विषयावर एका तासाच्या आत संसदेच्या दोन सभागृहात पूर्णपणे वेगळा आशय घेऊन बोलणे ही खायची गोष्ट नाही. पक्का गृहपाठ, उत्कृष्ट भाषणशैली आणि राजकीय समज असल्याशिवाय हे साध्य होऊ शकत नाही. शोकसंदेश लिहिण्यासाठी मोबाईलचा पडदा पाहणाऱ्यांना ते जमणारच नाही. एकुणात काय, तर विरोधकांनी काल जे काही केले त्यामुळे त्यांनी स्वतःलाच क्षुद्र करून घेतले. हात दाखवून अवलक्षण कसे करून घ्यायचे, याचा वस्तुपाठच विरोधकांनी घालून दिला.