Rahul Bravado Makes Good Show, But No Impact

Congress President Rahul Gandhi is unarguably in his prime as an opposition leader firing one after another salvo on Prime Minister Narendra Modi. he has got a good toy to play with in the form of Rafale deal. He and his coterie understand perfectly well that government cannot disclose all the facts pertaining to this deal due to the issues of national security. This allows him and his party to create confusion among the masses. However, unfortunately for him, people are not ready to buy his bravado as a serious act of a mature politician. With BJP coming with more counter attacks with every passing day, scion of the Gandhi family find himself in a precarious situation where he can neither lead the fight to its logical conclusion no can he leave it halfway.
In such a scenario, Rahul’s theatricks have only contributed to raising the entertainment quotient of the political discourse.

On Tuesday, Rahul Gandhi continued his tirade on Twitter and addressed Air Force officers, the families of martyred pilots as well as Hindustan Aeronautics Limited workers. He said that he understood the pain of jawans, and would work to bring to justice all those who dishonoured and stole from them.

“To every Air Force officer and Jawan who has served India. To the family of every martyred Indian fighter pilot. To every person who ever worked for HAL. We hear your pain. We understand how you feel. We will bring to justice all those who dishonoured and stole from you,” he said on Twitter.

Unlike his past campaigns, Rahul has shown some consistency in attacking the government on the Rafale deal, it must be acknowledged. However, he has already committed blunder by making his party organ, the recently rejected National Herald, to compare the scandal with the Bofors.

On Monday, he said the country’s “chowkidar” Modi snatched money away from the poor and handed it over to industrialist Anil Ambani. “The chowkidar of the country has taken out Rs 20,000 crore from the pockets of the poor, martyrs and the jawans and put it in the pocket of (Anil) Ambani,” Gandhi said at a meeting in the Jais area of his Lok Sabha constituency Amethi. This was one of the oldest statements made by Rahul ever since the Congress Party was relegated 44 seats in Lok Sabha and was forced to sit in the opposition.

However, the Congress’s past is going to haunt the party and Rahul for many days to come. if anything, Sambit patra’s counter attack proved this one thing.

BJP on Tuesday alleged that Congress was pointing fingers over the current Rafale Aircraft deal as it could not receive the kickbacks during the UPA regime and therefore the deal did not materialise. Briefing reporters in New Delhi today, BJP spokesperson Sambit Patra reiterated allegations that there was a close link between UPA chairperson’s son-in-law Robert Vadra and controversial arms dealer Sanjay Bhandari whose company has been red flagged by the NDA government. He claimed that during 2016 raids conducted at Bhandari’s places, several sensitive documents including papers related to Rafale deal were found.

Several TV channels have picked up pieces of this story and exposed supposed link between Rahul, Congress and Sanjay Bhandari. These charges are going to stick with the Congress party that has become synonymous with scams, scandals, inefficiency and nepotism. There is a large number of critics who see Rahul Gandhi as a very reluctant and inefficient leader who is yet to come to terms with his responsibilities. It is only recently that he has shown some seriousness towards his job and detractors have pointed out role of individuals like Jyotiraditya Scindia and Divya Spandana behind his makeover.


“After Modi government came to power, we started action against Sanjay Bhandari and his company. Starting as Rs 1 lakh worth company, Offset India Solutions slowly turned big with Robert Vadra’s help. There were raids in 18 places across India in 2016 and important papers including on Rafale were recovered,” Patra said.

The documents also included ‘confidential documents of Ministry of Defence’. “The papers also included proposals to buy mid-air refuellers and defence acquisition council papers. There were minutes of deliberations of the Contract Negotiations Committee”.

Moreover, Pakistan has also shown some interest in this episode and has overtly backed Rahul. With Pakistan being a perpetual adversary of India, no right thinking person in the country will like that one of its political leader is like by Pakistan. Thus, ironically, people tend to support PM Modi rather than dislike him the way did it Rahul’s father Rajiv Gandhi.

Therefore, the fact remains that Rahul’s bravado makes a good show and provides good copy to the paper, good footage to the channel and a lot of kilobytes for the digital media. But on ground, it does not make any impact at all.

यह कैसा है एका, जहां हर कोई अकेला

मुट्ठियां भींचते हुए और भौहें तनते हुए कांग्रेस तथा उसकी मिली जुली पार्टियों ने जिस विरोधी एकता की ललकार की थी, वह एक झटके में तार तार हो गई। और यह सब 3 महीने के भीतर! तथाकथित महागठबंधन का वजूद बनने से पहले ही बिखर गया! राज्यसभा में बहुमत होने के बावजूद विपक्षी दल उप सभापति पद के लिए अपने उम्मीदवार को जीता नहीं सके और वहीं यह भाजपा नीत एनडीए ने अपने झंडे गाड़ दिए। इससे विपक्षी एकता का जो शगूफा कुछ लोगों ने थोड़ा है वह खोखला है, इसका नजारा भी लोगों को हो गया।

इस चुनाव में संयुक्त जनता दल के हरिवंश नारायण सिंह को 125 और बी. के. हरिप्रसाद को 105 मत मिले। लोकसभा चुनाव में एक वर्ष से भी कम समय रहने के चलते यह चुनाव राजग और संप्रग दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

भाजपा ने राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए अपने सहयोगी हरिवंश को राज्यसभा उप सभापति पद के लिए मनोनीत किया। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के हरिप्रसाद को बड़े अंतर से हराया। हरिप्रसाद की राजनीतिक साख का अंदाजा इस बात से किया जा सकता है, कि पिछले 40 वर्षों के अपने राजनीतिक कैरियर में उन्होंने आज तक कोई चुनाव नहीं जीता है। कांग्रेस ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाकर अपनी फजीहत खुद की है। वैसे भी, राहुल गांधी के उदय के बाद पार्टी इसकी आदी हो चुकी है। खैर, अपना स्वतंत्र उम्मीदवार खड़ा करना देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए राजनीतिक चाल के रूप में समर्थनीय माना जा सकता है। लेकिन उस उम्मीदवार के लिए अन्य दलों से समर्थन मांगना किसके शान के खिलाफ था?

इस चुनाव में ऐसा भी मज़ेदार नजारा देखने को मिला कि कांग्रेस को नेस्तनाबूत करते हुए दिल्ली की सत्ता हथियानेवाली आम आदमी पार्टी उसको समर्थन देने के लिए मचल रही थी और कांग्रेस उससे किनारा करने की जद्दोजहद कर रही थी। इसी तरह सरकार का विरोध करनेवाली किसी भी पार्टी से तालमेल बिठाना कांग्रेसियों ने जरूरी नहीं समझा। महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी भाजपा को परास्त करने के लिए लालायित थी। लेकिन उसका समर्थन पाने के लिए भी कांग्रेस की ओर से कोई कोशिश नहीं की गई।


भाजपा की रणनीति

इसकी तुलना में, एनडीए नेतृत्व ने लगातार क्षेत्रीय दलों से संपर्क बनाए रखा। बीजू जनता दल जैसे जो क्षेत्रीय दल, जो एनडीए में नहीं है लेकिन जो घोर कांग्रेस विरोधी है, उन्हें पटाने में एनडीए नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। विजयी और पराजित उम्मीदवार के मतों में केवल बीस का अंतर देखते हुए बीजेडी के 9 मत कितने अहम होंगे, इसका अंदाजा किया जा सकता है।

इसका नतीजा जो होनेवाला था वह हुआ। जेडीयू के उम्मीदवार ने भारी विजय प्राप्त की और अब इसके लिए कांग्रेस किसी और को दोष नहीं दे सकती।

भाजपा ने अपना उम्मीदवार खड़ा ना करते हुए एक तीर से दो निशाने लगाए। एक तरफ तो जेडीयू के खफा होने की खबरों को उसने पूर्ण विराम दिया, वहीं गैर भाजपा दलों को सिंह के खाते में वोट डालने के लिए प्रेरित भी किया। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति को देखिए। तेलंगाना के इस सत्ताधारी दल ने कुछ ही महीने पहले तीसरे मोर्चे का आगाज किया था। टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव भाजपा विरोधी महागठबंधन की धुरी बनकर उभरे थे। लेकिन उसी टीआरएस ने अपना मत जेडीयू के पाले में डाल दिया। आंध्र प्रदेश के वाईएसआर कांग्रेस ने ना भाजपा को वोट दिया ना कांग्रेस को, बल्कि अनुपस्थित रहकर एनडीए की मदद की। हां, तेलुगू देशम पार्टी ने जरूर कांग्रेस को समर्थन दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस और टीडीपी में 2019 में गठबंधन होगा। कारण यह, की आंध्र में टीडीपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस है और आंध्र में कांग्रेस का संघटनात्मक आधार बहुत ही कम है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के अव्यवस्थित विभाजन को लेकर वहां के लोग कांग्रेस और यूपीए से अभी भी नाराज है। इसलिए उसके साथ रहना कोई नहीं चाहेगा। तमिलनाडु की सत्ताधारी अन्नाद्रमुक ने भी सरकार के साथ रहना पसंद किया। तमिलनाडु के वर्तमान नेतृत्वहीन परिदृश्य में वहां की पार्टी मोदी जैसे सशक्त नेता से दूरी कभी नहीं बनाएगी।

अकाली दल और शिवसेना जैसे नाराज चलनेवाले दलों से दिलमिलाई करने के लिए भी भाजपा ने इस मौके का फायदा उठाया। यानि वर्तमान दोस्तों को कायम रखते हुए वह नए दोस्तों की खरीदारी करती रही।

कुल मिलाकर कांग्रेस के पास तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, डीएमके, पीडीपी और वामपंथियों के वोट रहे। क्या यह सारे दल अगले चुनाव में कांग्रेस के साथ खड़े रहेंगे? क्या राहुल गांधी का नेतृत्व उन्हें रास आएगा? इस चुनाव ने दिखा दिया, कि अधिकांश क्षेत्रीय दल अवसरवादी है और जिस दिल के पास सत्ता स्थापना के अवसर अधिक है उसके साथ जाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। जिस तीसरे मोर्चे की डिंगे यह दल हांक रहे थे, और कांग्रेस उनके सुर में सुर मिला रही थी, वह बस दूर की कौड़ी है।

यहां कोई एका नहीं है बल्कि यहां हर कोई अकेला है।

लेनिन लगता कौन है आपका? बाप? दोस्त या मालिक?

यूरोपीय संसद की सदस्या सँड्रा कैल्निएट (Sandra Kalniete) की एक पुस्तक है साँग टू किल ए जायंट। इस पुस्तक में सँड्रा ने तत्कालीन सोवियत शासन के खिलाफ उनके देश लाटविया के स्वतंत्रता आंदोलन का वर्णन किया है। इस पूरी पुस्तक में भारत (इंडिया) का एक उल्लेख केवल एक बार आया है जब दमनकारी शासन के विरोध में एक युवा विद्रोही कार्यकर्ता के तौर पर सँड्रा को सज़ा के तौर पर वहां भेजा जाता है। उस समय के सोवियत दूतावास का वर्णन सँड्रा ने कुछ इस तरह किया है, “वहां का माजरा देखकर मैं हैरान रह गई। वहां हर सोवियत अधिकारी स्थानीय लोगों के साथ ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वह मालिक हो और स्थानीय लोग गुलाम। मेरे लिए यह एक सांस्कृतिक सदमा था।”

यह उस लेखिका ने लिखा है जो एक शोषणकारी और अत्याचारी शासन के खिलाफ आंदोलन कर रही थी। उस शोषणकारी और अत्याचारी शासन में भी गुलामी का जो भाव उसे नहीं दिखा, वह उसे नई दिल्ली के सोवियत दूतावास में दिखा। यह प्रसंग बताने के लिए काफी है, कि तत्कालीन सोवियत शासकों का भारत के प्रति रवैय्या कैसा था।

इस वाकये का संस्मरण होने का कारण था व्लादिमिर लेनिन की मूर्ति का उखाडना। त्रिपुरा में भारतीय जनता पक्ष की विजय के बाद हवा बदलने लगी है। उसी के चलते दक्षिण त्रिपुरा जिले के बेलोनिया में कम्युनिस्ट नेता व्लादिमिर लेनिन की एक प्रतिमा जेसीबी मशीन का इस्तेमाल कर गिरा दी गई। कुछ ही महिनों पहले पहले पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य प्रकाश करात ने इस प्रतिमा का अनावरण किया था। इस घटना को लेकर मार्क्सवादी खेमे में बौखलाहट स्वाभाविक है, लेकिन समस्त लिबरल कैंप में इसको लेकर बेचैनी है। लेनिक के रूस ने किस तरह भारत की मदद की, लेनिन कितना महान आदी चीजों की दुहाई दी जा रही है। हालांकि यह स्पष्ट हो नहीं पा रहा है, कि ये लोग बेचैन किस बात से है – मूर्ति गिराने को लेकर या प्रतिमा को गिराये जाने के बाद भारत माता की जय के नारे भी लगाने को लेकर?

जिस त्रिपुरा में लेनिन और स्टालिन की जयंती मनाई जाती हो, लेकिन रबीन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और महाराजा वीर विक्रम देव की जयंती कभी नहीं मनाई जाती थी वहां भारत माता की जय के नारे लगना अपने आप में एक कयामत है। इससे लिबरलों के मन में कसमसाहट के गुबार उठना जायज ही नहीं, स्वाभाविक भी है। ये वही लोग है जो वीर सावरकर की काव्य पंक्तियां जब अंदमान के सेल्युलर जेल से हटाई गई तो खुशी से चहक उठे थे। ये वही लोग है जिनकी आंखे त्रिपुरा और केरल में मार्क्सवादी गुंड़ों के हाथों मारे गए लोगों के लिए आंसू बहाना हराम समझती है। इनके लिए 80 साल पहले मर चुके एक निर्दय हत्यारे की स्मृति अधिक महत्वपूर्ण है बनिस्बत उनके जो तुम्हारी-हमारी तरह जीते-जागते इन्सान है। हाल ही में केरल में एक 30 वर्षीय कांग्रेस कार्यकर्ता शोएब की हत्या की गई और उसके परिवारवालों का कहना है, कि माकपा के हत्यारों ने इसे अंजाम दिया है। लेकिन उनके लिए यह कोई विषय ही नहीं है।

आखिर लेनिन कौन था? भारतीयों से उसका संबंध क्या था?

सोवियत रूस में 72 वर्षों तक लेनिन की पूजा की गई, यहां तक की उसका शव भी नहीं दफनाया गया। मास्को में एक भव्य मकबरे में कांच के विशाल बक्से के भीतर लेनिन का शव आज भी सुरक्षित है। हर जगह उसकी मूर्तियां स्थापित की गई। लेकिन मार्क्सवाद या लेनिनवाद एक अप्राकृतिक कल्पना थी, जिसका ढहना तय था। धर्म को अफीम, अध्यात्म को अंधविश्वास और आस्था को मूर्खता कहनेवाले स्वघोषित विचारकों की पराकोटी की व्यक्ति पूजा नहीं तो और क्या है? लेनिन का शासनकाल था सन 1918 से 1924 तक. इसी को रेड टेरर (लाल आतंक) के रूप में जाना जाता है। सितंबर 1918 में याकॉव स्वेरडलोव द्वारा अधिकारिक रूप से इसकी घोषणा की गई थी। चेका (बोल्शेविक गुप्त पुलिस) ने लाल आतंक के दमन को अंजाम दिया था। इस दौरान लगभग 100,000 हत्याएं होने का अनुमान है जबकि मारे जानेवालों की कुल संख्या 200,000 मानी गई है।

सोवियत संघ के विघटन के बाद खुद रूसी लेखकों ने लेनिन के यौन पिपासु, विश्वासघाती और बर्बर अत्याचारों का जो कच्चा चिट्ठा खोला है। वह एक महान सेनानी, दूरदर्शी नेता और समानता का दूत कतई नज़र नहीं आता, जैसा कि हमारे वामपंथी उसे दिखाना चाहते है। रूसी रिकार्ड उसे वही बताते है जो वह था – निर्मम शासक, अत्याचारी और एक धूर्त राजनेता। यही तो वजह है, कि खुद रूस की नई पीढ़ी उसे अपनाना नहीं चाहती। सोवियत तंत्र के ढ़हने के बाद सबसे पहले किस चीज को ढहाया गया? अर्थात् लेनिन की मूर्ति को!

यह शर्म की बात है, कि जिस लेनिन को उसके अपने देशवासियों ने नकारा है उसी के भक्त हमारे यहां पैदा हो गए है। लेनिन-भक्ति रूस में मर गई लेकिन भारत में जिंदा है। क्या लेनिन इनका पिता है? कौन सी विचारधारा का पितृत्व लेनिन के पास जाता है? क्या लेनिन इनका दोस्त है? लेनिन के काल में दोस्ती की कौन सी मिसाल पेश हुई, यह भी तो बताएं। इस लिहाज से इनका पूरा खाता खाली है।

हां, यह हो सकता है, कि लेनिन इनका मालिक है। कम्युनिस्ट हमेशा पहले रूस और अब चीन के कदमताल पर चलने के लिए जाने जाते है। इनकी इसी रूसधर्मिता के कारण जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस स्वतंत्रता की लढ़ाई लढ़ रहे थे, तब कम्युनिस्ट पत्रिकाएं उन्हें टोजो (जापान के सेनानी) का कुत्ता कह रहे थे।

और यही कम्युनिस्ट (सेकुलर, लिबरल आदी सबको मिलाकर) जब भगतसिंग की दुहाई देकर लेनिन का महीमा मंडन करते है तो और आश्चर्य होता है। लेनिन के अत्याचारों का पुलिंदा तो काफी बाद में खुला, इसलिए भगतसिंग को उसकी जानकारी होने का सवाल ही नहीं। तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में रूस की क्रांति से सभी क्रांतिकारी प्रभावित हुए थे, इसमें दो राय नहीं है। अगर भगतसिंग जिंदा रहते और उन्हें लेनिन (और स्टैलिन) की सच्चाई पता चलती तो वे भी उनसे मुंह मोडते। अपनी फांसी से पहले भगतसिंग ने शायद लेनिन की जीवनी पढ़ी भी हो, लेकिन क्या यह बात झूठी है, कि भगतसिंग को सज़ा जिस हत्या के लिए हुई थी, वह एक आर्य समाजी (लाला लजपत राय) का बदला लेने के लिए की गई थी।

भगतसिंग भारतीय थे, लिबरलों, जो तुम नहीं हो।

गुजराती प्रयोगशाळेचा ‘मेवा'(णी)

गुजरात हे राज्य हिंदुत्वाची प्रयोगशाळा म्हणून ओळखले जाते. हिंदुत्वाची प्रयोगशाळा होते तोपर्यंत तेथे उत्तम रस्ते, चोवीस तास वीज, पाणी, फ्लायओव्हर अशा गोष्टी होत होत्या. पण 12 वर्षे तेथे राज्य केल्यानंतर नरेंद्र मोदी उत्तरेकडे सरकले आणि दिल्लीत स्थानापन्न झाले. मग शिक्षक वर्गातून गेल्यानंतर पुढचे शिक्षक येईपर्यंत वांड मुलांनी गोंधळ घालावा, तसे जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल आणि अल्पेश ठाकोर यांसारख्यांना रान मोकळे मिळाले. मग एक नवीन प्रयोग गुजरातमध्ये सुरू झाला – फाटाफुटीचा, विद्वेषाचा आणि घडवून आणलेल्या उद्रेकाचा.

याची सुरूवात गुजरातमध्ये ऊनात दलितांना मारहाण करून झाले. त्यावेळी त्या प्रकरणात काँग्रेसच्या स्थानिक लोकांचा संबंध असल्याच्या चर्चा होत्या. पण त्याचे बिल भाजप आणि मोदींच्या नावावर फाडून झाले. त्याचा यथावकाश परतावा मेवाणीला आमदारकीच्या रूपाने मिळाला.

याच प्रयोगाची फळे आता कोरेगाव भीमामध्ये दिसू लागली आहेत. वास्तविक ही फळे दिसावी, यासाठी गेले काही दिवस जाणीवपूर्वक प्रयत्न केले जाते होते. खाजवून खरूज काढावी, तशी मुद्दाम चिथावणी दिली जात होती. मेवाणीला शनिवारवाड्यावर बोलावणे, त्याच्यासोबत मौलानाला बसवणे, ब्राह्मणांच्या नावाने गरळ ओकणे हे सगळे उद्योग त्यासाठीच चालू होते.

नक्षलवाद्यांशी संबंध असल्याचा संशय असलेला “कबीर कला मंच’ शनिवारवाड्यावरच्या एल्गार परिषदेत पुढे होता. या मंचाच्या सदस्यांनी सादर केलेल्या नाटिकेतून पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांच्यावर सडकून टीका करण्यात आली. त्यानंतर प्रत्यक्ष या ‘विजयस्तंभा’च्या ठिकाणी काही तरी घडावे, असा प्रयत्न चालू होता.

त्यासाठी वढू गावातील शूरवीर गोविंद गायकवाड यांच्या समाधीची काही अज्ञातांनी तोडफोड केली. त्याबद्दल येथे झालेला वाद मिटलेला होता. तरीही तो उकरून काढण्यात आला. त्याचेच पर्यवसान पुणे-नगर महामार्गावरील दगडफेक आणि जाळपोळीत झाले. त्यात पोलिसांसह काही जण जखमी झाले असून एकाचा मृत्यू झाला आहे. आता या दगडफेक आणि हिंसाचारामुळे स्थानिक लोकांमध्ये कोरेगावला जाणाऱ्या दलितांबद्दल आकस आणि त्यांच्या मनात दलितांबद्दल अप्रीतीही निर्माण होणार! पण इकडे मेवाणी आणि त्याच्या कंपूचा हेतू साध्य होणार कारण दलित – मराठ्यांमध्ये बेबनाव झाला तरी उमर खालिद व मौलाना अजहरी हे मात्र दलितांसाठी जवळचे ठरणार. हाच यांचा डाव आहे.

दलित कार्यकर्त्यांवरील हल्ला हा दलित आणि मराठा संघर्ष पेटविण्याचा षड्यंत्राचा भाग असल्याचा आरोप रामदास आठवले यांनी केला आहे, त्यात म्हणूनच तथ्य आहे. अन् इथून पुढे प्रत्येक पाऊल सावधपणेच टाकावे लागणार आहे. ‘पेशवाई’ मसणात घालण्यासाठी हे लोक संपूर्ण समाजाचेच स्मशान करण्यासही मागे-पुढे पाहणार नाहीत.

आत्मैव रिपुरात्मनः?

कोरेगाव भीमा येथील विजयस्तंभ आणि ‘शौर्य दिन’ साजरा करण्यावरून बराज गाजावाजा करण्यात येत आहे. त्याची कठोर चिकीत्सा करणारा लेख स्नेही राजेश पाटील यांनी लिहिला आहे. त्यांच्या परवानगीने तो येथे प्रकाशित करत आहे.

दि. १ जानेवारी रोजी महाराष्ट्रातील, पुण्याजवळ ‘कोरेगाव भीमा’ येथे ‘शौर्य दिन’ साजरा करण्याचे काही सामाजिक संस्थांकडून योजले आहे असे कळते! त्यातील एका निवेदनात “२०० वर्षांपूर्वी निर्धाराने भीमा कोरेगावच्या युद्धात महार सैनिकांच्या नेतृत्त्वात इतर जातधर्मीय सैनिकांनी पेशवाई संपवली होती” असा उल्लेख आहे!! यात २०० वर्षे म्हणजे सन १८१८, हे युद्ध खरे तर परकी ब्रिटिश सत्ता व स्वदेशी हिंदुस्थानी मराठेशाही यांच्यात झाले होते व त्यात ब्रिटिशांच्या बाजूने जसे एतद्देशीय सैनिक होते तसेच मराठेशाहीच्या बाजूने देखील एतद्देशीय सैनिक लढले होते!! ही काही ‘दलित/बहुजन’ व ‘ब्राह्मण’ यांच्यातील लढाई नव्हती!! ‘

पेशवे’ म्हणजे ‘पंतप्रधान’ हे पद स्वतः छ. शिवाजी महाराजांनी निर्माण केले होते!! ‘पेशवे’ हे मराठा छत्रपतींचे पंतप्रधान होते! म्हणजेच ते मराठेशाहीचे प्रतिनिधित्व करत होते!! आणि युद्धातील जय – पराजय हा त्या युद्धात उतरणाऱ्या, एकमेकांच्या विरुद्ध लढणाऱ्या दोन पक्षातील सर्वोच्च दायित्व असलेल्या राजकीय सत्तांचा असतो!! म्हणून या युद्धातील जय वा पराजय याचे श्रेय/दोष ‘ब्रिटिश’ किंवा ‘मराठेशाही’ यांना देण्यात यायला हवे! व तेच ‘खरे’ इतिहासकार करतात!! (आणि या युद्धात तर तत्कालीन छत्रपती देखील होते असा देखील उल्लेख सापडतो!!) पण इथे मात्र एका बाजूला ‘दलित/बहुजन’ व दुसऱ्या बाजूला ‘पेशवे’ – म्हणजेच – ‘ब्राह्मण’असा जातीय रंग या घटनेला देण्यात येत आहे, असे या संस्थांच्या निवेदनातील भाषेवरून वाटत नाही का?

आणखी एक प्रश्न असा विचारावासा वाटतो कि, हाच जातीय तर्क जर वापरायचा झाला तर मग इतर घटनांच्या बाबतीत देखील तो लावायला हवा!! तो लावायची तयारी या संस्थांची आहे का? उदा. ब्रिटिशांच्या ‘जनरल डायर’ने पंजाब मधील जालियनवाला बाग येथे अनेक निरपराध हिंदुस्थानींना मारले होते!! त्यात डायरच्या ‘हुकुमा’वरून गोळ्या झाडणारे बहुसंख्य भारतीयच होते — त्यात दलित/बहुजन देखील असतील – व मरणाऱ्यात बहुसंख्येने शीख देखील असतील — आणि तसे जर असेल व या संस्थांच्याच तर्काने जायचे झाले तर ‘दलित/बहुजन यांनी निरपराध हिंदुस्थानींना गोळ्या घालून मारले’ असे म्हणण्यासारखे होणार नाही का? म्हणून हा तर्क किती घातकी व विषारी आहे याचा विचार सर्वांनी केला पाहिजे!!

या संस्था एकीकडे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, छ. शिवाजी महाराज यांचे देखील नाव घेतात… यावरून एक आठवण करून द्यावीशी वाटते ती ही कि, माझ्या माहितीप्रमाणे बडोद्याच्या सयाजीराव गायकवाडांना छ. शाहू महाराजांनी डॉ. आंबेडकरांची शिफारस केली होती व त्या बळावर डॉ. बाबासाहेब हे देशातील व पुढे अमेरिकेत जाऊन पुढील शिक्षण घेऊ शकले व डॉक्टरेट मिळवू शकले!! त्यानंतर त्यांना नोकरी देखील बडोद्याच्या गायकवाड महाराजांनी दिली!! बडोद्याचे गायकवाड घराण्याचे राज्य हे छत्रपतींच्या अधिपत्याखालील अखिल मराठा साम्राज्याचा भाग असेलेल्या मराठेशाहीचेच अभेद्य अंग आहे! तसेच ‘दलितांना’ या देशाच्या इतिहासातील ‘पहिले आरक्षण’ मराठेशाहीचे वंशज, कोल्हापूरचे छ. शाहू महाराज यांनीच दिलेले होते!! म्हणजे, मराठेशाहीचे छत्रपतींच खरे ‘दलित मित्र’ होते असा होत नाही का? आणि पेशवे तर त्याच मराठा साम्राज्याचे म्हणजेच मराठेशाहीचे पंतप्रधान, म्हणजेच प्रतिनिधी होते!! याचा अर्थ, ‘पेशव्यांना’ विरोध म्हणजे मराठेशाहीलाच विरोध नव्हे काय? म्हणजे, आताचे काही दलित हे अंतिमतः ‘दलित मित्र’ मराठेशाहीलाच विरोध करताहेत असा त्याचा अर्थ होत नाही का? ही प्रतारणा नव्हे का?

आणखी एक मुद्दा मांडावासा वाटतो – तो म्हणजे या संस्था या घटनेला ‘जातीअंताचं प्रतीक’ असे म्हणताहेत !! याविषयी असे सांगावेसे वाटते कि, मराठेशाहीच्या सैन्यात देखील दलित होते हे काही वेगळे सांगायची गोष्ट नाही ! पण ते सर्व ‘मराठे’ म्हणून लढले व देशाला परकीय सत्तांपासून वाचविले!! ‘मराठा’ म्हणजे, समर्थ रामदास स्वामी यांनी ‘मराठा तितुका मेळवावा, महाराष्ट्र धर्म वाढवावा’ या संदेशातून – ‘शौर्य व वीरश्रीने ओतप्रोत, परकीय सत्तांशी लढून स्वदेशाचे व स्वधर्माचे रक्षण करणारा वीर’ म्हणजे ‘मराठा’ अशी ‘गुणवाचक’ व्याख्या केली आहे! ती ‘जातीवाचक’ नव्हे! म्हणजेच मराठेशाहीचे प्रतिनिधी असलेल्या पेशव्यांच्या सैन्यातील ‘दलित हे ‘मराठे’ म्हणून होते व ब्रिटिशांच्या सैन्यातील दलित हे ‘महार’ म्हणून होते आणि या संस्था म्हणतात त्याप्रमाणे ब्रिटिशांनी जर फक्त ‘दलित’ म्हणून दलितांना वागविले तर यात जातीयवाद कोण करत आहे? यातील कोणते संबोधन जातीवाचक आहे? यातील कोणत्या संबोधनाने ‘जातीअंत’ होऊ शकेल?

पुढील मुद्दा असा आहे कि – काही इतिहासकारांच्या मते ‘भीमा कोरेगावची लढाई हि काही अंतिम लढाई नव्हती !… त्यात मराठ्यांनी युद्ध नीतीचा भाग म्हणून थोडे युद्धाला तोंड फोडले व शत्रूला आपला पाठलाग करायला लावून खिंडीत गाठण्याचा देखील त्यांचा प्रयत्न असू शकतो! उदा. धर्मगड (बहादूरगड) ची लढाई मराठ्यांनी अशाच प्रकारे जिंकली होती!! तसेच, सर्व हिंदुस्थान जिंकून काढणारा औरंगजेब देखील मराठ्यांच्या याच नितीमुळे हैराण होऊन शेवटी याच महाराष्ट्रात गाडला गेला!! म्हणून ब्रिटिशांनी जर ‘कोरेगाव भीमा येथे मराठ्यांचा पराभव झाला’ असे लिहून ठेवले असेल तर हे विधान एकतर्फी होत नाही का?

तसेच, या संस्थांच्या एका पदाधिकाऱ्याने “मुस्लिमांनी सर्व शक्ती लावून (हिंदूंमधील)बहुजनांना ब्राह्मण धर्मापासून मुक्त केले पाहिजे!” अशा अर्थाचे संदेश दिले आहेत!! याचा अर्थ,हिंदूंना मुसलमान करण्याचा हा डाव नाही का? आणि असल्या कारवायांपासून आपण सावध राहिले पाहिजे अशी भूमिका दलितांसह सर्व बहुजनांनी घ्यायला नको का? आता, गिरिजन, वनजन, आदिजन, बहुजन, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शैव, वैष्णव, शीख, जैन, बौद्ध इत्यादींसह सर्व हिंदूच आहेत!!

ब्राह्मणीधर्म हे विशेषण परकीय सत्तांनी हिंदूंमध्ये फूट पाडण्यासाठी आणले आहे असे म्हटले जाते! काही अभ्यासक विचारवंतांच्या मते, काही परकी पांथिक शक्ती, ‘इतर देशाशी प्रत्यक्ष युद्ध न करता, त्या देशातील समाजात अंतर्गत फूट पाडून यादवी माजविली कि अशा फूट पाडलेल्या समाजाला व त्याद्वारे राष्ट्रांना सहजपणे ताब्यात घेता येते’ अशा प्रकारच्या नीतीचे अवलंबन करतात, म्हणजे या दुहीमुळे स्वतः समाजच स्वतःचा शत्रू होतो!! आणि देश जर प्रगतीपथावर न्यायचा असेल तर आपल्यातील ‘बंधुभाव’ कसा दृढ होईल ते पाहिले पाहिजे- भगवद्गीतेतील आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः हे वचन एकट्या फक्त अर्जूनासाठीम्हटलेले नसून आपणा सर्वांसाठी आहे!! त्याला भारतीय समाज बळी पडू नये याची काळजी सर्वांनी घ्यायची आवश्यकता आहे!

शेवटचा व सर्वात महत्वाचा मुद्दा म्हणजे, अनेक लोक हा लेख वाचल्यावर म्हणतील की, ‘आम्ही त्या स्मारकावर जाऊ नये का?’ – मी म्हणेन ‘अवश्य जावे’ पण, स्मरण आणि वंदन – जे या मातृभूमीसाठी लढले त्यांचे करण्यासाठी!! या घटनेचे विश्लेषण एखाद्याने वरीलप्रमाणे केले तर ते चुकीचे असेल का?

राजेश पाटील

संदर्भ :

Remembering Joginder Singh

<p style=”text-align: justify;”> Inside CBI Joginder SinghAs the special CBI court delivered its verdict to pronounce Lalu Prasad Yadav guilty in Fodder Scam case, the memories of late Joginder Singh were rekindled. Had he been alive today, he would be a satisfied man today. It was his painstaking efforts that brought the culprits to books in one of the most talked about cases in the country. If today Lalu is today punished for his brazen misdeeds, it is only because of integrity & uprightness of officers like Joginder Singh.

<p style=”text-align: justify;”>I never met Joginder Singh personally nor did communicated with him in any manner. However, his name is etched in my memory because it has something to do with my career. When I joined a newspaper as a copy editor cum translator, my job profile included translating English books into Hindi and.sometimes Marathi. They were not meant for immediate publication in print, but formed a ‘morgue’ of reference material. “Inside CBI”, the book that details many high profile cases, was making waves at that time.

<p style=”text-align: justify;”>Lalu Prasad Yadav had already made himself unpopular by that time. The NDA government led by Atal Bihari Vajpayee was at the helm. Singh had already retired and it was clear that he had not left the office with much content. The Fodder Scam was hogging headlines for a year or so. There was hardly any day when one did not bump with one or another story related to scam.

<p style=”text-align: justify;”>Therefore, translating Inside CBI’ was one assignment that pleased me thoroughly. As an earnest entrant to the mesmerizing world of news, opinions and gossips, this was the very fodder that I looked forward to enrich my knowledge.

<p style=”text-align: justify;”>And Joginder Singh took me to a different world altogether. Intrigues, bureaucracy, policing and governance!

<p style=”text-align: justify;”>Admittedly written under the constraints and stipulations of the constitutional body, the book nevertheless gives a deep peek into the working of CBI. One gets to understand what a mountain of difficulties and tribulations Singh had to go just to perform his duty. At one point of time, the Prime Minister of the country himself asked him to stop the investigation. Only an officer with as high integrity as Mr. Singh could answer back in the manner that he did. When the then PM Inder Kumar Gujral asked him to halt the investigation, Singh told him, “Give me the order in writing and I will stop it”. This sturdy stance is the reason we are seeing the looters of the government coffers standing before the court as accused and convicted.

<p style=”text-align: justify;”>The 1961 Karnataka cadre batch IPS officer was chosen to head CBI in 1996 when H. D. Deve Gowda was the Prime Minister. Besides Fodder Scam, he was also part of the investigation team of Bofors scam and many other sensitive cases like securities scam, the JMM MPs bribery scandal, Rs 133 crore urea scam, telecom deals by the then Union minister Sukh Ram, among others.

<p style=”text-align: justify;”>In an interview with The Hindu, he had told that many temptations were thrown at him when the agency was probing the fodder scam.

<p style=”text-align: justify;”>Today, Joginder Singh is not among us. He left us in February 3 this year after a long service and writing over 25 books. And because of one of these books that I remember him. Today is the best day to remember this gusty officer.

भाजपला रजनीकांत मिळाला…कर्नाटकात!

भारतीय जनता पक्षाने तमिळनाडूत हातपाय पसरण्याचे जोरदार प्रयत्न चालवले आहेत. सुपरस्टार रजनीकांत यांना पक्षाने हाताशी धरले आहे. भाजपने मारलेल्या हवेमुळेच रजनीकांत यांची महत्त्वांकाक्षा जागृत झाली आणि म्हणूनच त्यांनी राजकारणात प्रवेश करण्याचा निर्णय घेतला आहे, अशी बोलवा आहे. अण्णा द्रमुकच्या सर्वेसर्वा जयललिता यांच्या जाण्यानंतर निर्माण झालेली पोकळी भरून काढण्याची भाजपची इच्छा आहे. निर्नायकी अण्णा द्रमुक आणि भाऊबंदकीत अडकलेला द्रमुक यांच्यातील फटीतून सत्तेपर्यंत जाण्याचा त्या पक्षाना मनसुबा आहे. त्यात रजनीकांत यांच्यासारखा मोहरा त्यांना दुसरा सापडणार नाही.
परंतु भाजपची ही स्वप्नपार्टी ऐन रंगात येत असतानाच कमल हासन नावाच्या गड्याने त्या दुधात मिठाचा खडा टाकला. सत्ताधारी अण्णा द्रमुकवर एकामागोमाग शरसंधान करत कमल हासननेही सिंहासनाच्या खेळाल शड्डू ठोकला. आता तीन-चार (किंबहुना जास्तच!) फळ्या झालेल्या अण्णा द्रमुक माणसाळवण्यासाठी भाजपला किती तोशीस पडली, हे भाजपला माहीत! शक्य तोवर रजनीकांतला पक्षात घ्यायचे आणि ते नाही जमले तर त्याला स्वतंत्र उभे करायचे आणि त्यातून द्रमुकला एका प्रतिस्पर्ध्यात गुंतवून ठेवायचे, इकडे आपण अण्णा द्रमुकशी युती करून त्यांच्या भरभक्कम संघटनेचा लाभ घ्यायचा, ही भाजपची शक्कशल होती. परंतु पडद्यावयर सकारात्मक व नकारात्मक अशा भूमिका लीलया करणाऱ्या कमल हासनने येथे नकारात्मक पात्र उभे केले. कमलने तेथे कमळाला नख लावले म्हटले तरी चालेल.
तमिळनाडूत उधळलेला भाजपचा मनसुबा कर्नाटकात मात्र पूरा होताना दिसतोय. तिथे आगलावू राजकारण करणाऱ्या सिद्धरामय्या यांच्या विरोधात ‘चकचकीत’ स्पर्धा उभी राहिली आहे. या स्पर्धेचा भाजपला कितपत फायदा होईल, हे काळच सांगेल. पण कर्नाटकातील तीन पायांच्या शर्यतीला त्यामुळे एक वेगळा आयाम मिळलाय, हे नक्की!
कन्नड नट उपेंद्र याने नुकताच राजकारणात प्रवेश करण्याचा आपला निर्णय जाहीर केला आहे. त्याच्या पक्षाचे नाव जाहीर झालेले नसले, तरी आपल्या सार्वजनिक कार्यासाठी ‘प्रजाकीय’ असा छान शब्द त्याने दिला आहे. त्याच्या या उपक्रमाला प्रतिसादही चांगला मिळाला आहे. ही घोषणा करताना थेट खाकी सदऱ्यात येऊन त्याने फिल्मी रंगही दिला. कुठल्याही कार्यालयाचा गणवेष असतो, तसा राजकारण्यालाही हवा, म्हणून मी खाकी सदरा घातल्याचे स्पष्टीकरण त्याने दिले आहे.
कर्नाटकात राजकारणातील नट-नट्या हा काही अप्रूपाचा विषय नाही. सुपरस्टार राजकुमार यांच्यापासून अनेक जणांनी हा मार्ग चोखाळला आहे. खुद्द सिद्धरामय्या यांच्या मंत्रिमंडळात अंबरीष आणि उमाश्री हे दोन मंत्री चित्रपट क्षेत्रातील होते. त्यातील अंबरीष यांनी आता काँग्रेसला रामराम केला आहे. याशिवाय रम्या (दिव्या स्पंदना) ही कांग्रेसची माजी खासदार व पक्षाच्या सोशल मीडियाची प्रमुख ही सुद्धा चित्रपट क्षेत्रातीलच आहे. मात्र स्वतंत्र पक्ष काढण्याची हिंमत आतापर्यंत कोणीही केली नव्हती. ती पुढील महिन्यात वयाची 50 वर्षे पूर्ण करणाऱ्या उपेंद्रने केली आहे.
कर्नाटकातील राजकारण म्हणजे कॉंग्रेस, भाजप आणि धर्मनिरपेक्ष जनता दल (जेडीएस) या तीन पायांची शर्यत झाले आहे. उपेंद्रचा प्रजाकीय आता त्या राजकारणाचा चौथा खांब बनणार का, याची उत्सुकता निर्माण झाली आहे. वास्तविक उपेंद्र भाजपमध्ये प्रवेश करणार असल्याच्या जोरदार चर्चा होत्या. अमित शाह यांचा नुकताच कर्नाटक दौरा झाला, त्याच मुहूर्तावर तो हातात कमळ घेईल अशी अपेक्षा होती. मात्र नवा पक्ष काढून त्याने या कथेला वेगळेच वळण दिले आहे. अमित शहा कर्नाटकाच्या दौऱ्यावर असतानाच उपेंद्रने आपला इरादा जाहीर केला, हे महत्त्वाचे. वास्तविक शहा यांच्या दौऱ्यातच उपेंद्र भाजपमध्ये प्रवेश करणार असल्याच्या चर्चा कर्नाटकात सुरू होत्या. पण कथेत नवीन वळण आले आणि त्यांनी वेगळी चूल मांडली.
आगामी विधानसभा निवडणुकीत आपला पक्ष उतरणार असून सर्व 224 मतदारसंघांमध्ये पक्ष उमेदवार उभे करणार आहे, असे त्यांनी जाहीर केले आहे. “विजय किंवा पराभव यांपैकी कशानेही मी निराश होणार नाही. मी कर्मावर विश्वास ठेवतो, ” असे भगवद्गीतेतील श्लो भगवद्गीतेतील श्लोक उद्धृत करून त्यांनी सांगितले. याचा अर्थ निव्वळ दुसऱ्यांची मते खाल्ली तरी त्यांना चालणार आहे. “मला टार्गॆट्‌ असे नाही, राजकारणात येणे एवडेच बस,“ असे त्याने उदयवाणी या वृत्तपत्राला सांगितले. आपल्या महाराष्ट्राप्रमाणेच ‘भारतक्के नरेंद्र, कर्नाटकक्के उपेंद्र’ ही घोषणाही फेसबुकवर दिसते.
थोडक्यात म्हणजे भाजपने तमिळनाडूसाठी लिहिलेल्या पटकथेचे चित्रीकरण कर्नाटकात होत आहे. तिथे रजनीकांतचे तळ्यात-मळ्यात संपत नसताना इकडे कर्नाटकात मात्र ती पटकथा प्रत्यक्षात उतरली आहे.

दादागिरी चालते, भाईगिरी चालते मग अण्णागिरी का नाही?

          १५ ऑगस्टच्या स्वातंत्र्यदिनापेक्षाही अधिक उत्सुकता असलेले अण्णा हजारेंचे आंदोलन अखेर आज सुरू झाले आणि तुरुंगात त्यांची रवानगी होण्यात त्याची परिणतीही झाली. गोचिडांनी कातावलेल्या कुत्र्याने स्वतःभोवती गिरक्या घ्याव्यात त्याप्रमाणे अण्णांच्या आंदोलनाने भांबावलेल्या काँग्रेस सरकारने अत्यंत हडेलहप्पी करून अण्णांना अटक केली. अण्णांच्या आंदोलनाला बाबा रामदेव यांच्या फसलेल्या आंदोलनाचे स्वरूप देण्याची मंशा काँग्रेस नेत्यांनी अनेकदा व्यक्त केली होती. मात्र बाबा रामदेव यांच्या नौटंकीवजा उपोषणापेक्षा अण्णांच्या उपोषणात नैतिकतेची धार कितीतरी अधिक होती व आहे. याचा अंदाज काँग्रेसच्या स्वयंमन्य नेत्यांना, ज्यांना इतरांना जिंकविण्याचे तर सोडाच पण स्वतःलाही जिंकणे जमणार नाही अशा नेत्यांना, हे समजण्याची शक्ती नाही. याच नेत्यांनी संसद ही लोकांनी निवडून दिलेली असल्याने ती अधिक पवित्र असल्याचा धोशा लावावा, ही अगदीच विसंगती होय.
            अण्णांच्या आंदोलनाला असलेली विद्यार्थ्यांची साथ ही गेल्या कित्येक दशकांतील अभूतपूर्व अशी घटना होय. गुजरात किंवा बिहारमधील विद्यार्थ्यांच्या आंदोलनाच्या कथा-कहाण्या वाचलेल्या आमच्यासारख्यांना या गोष्टीचे अप्रूप वाटावे, यात नवल काय. फक्त ही साथ केवळ बोलघेवडेपणापुरती राहण्याचा धोका अधिक आहे आणि शेवटपर्यंतची लढाई अण्णांना एकट्याने लढावी लागेल, ही भीती मी आधीपासून व्यक्त करत आहे. सकाळी अण्णांना अटक झाल्यानंतर देशभरात उमटलेल्या प्रतिक्रिया समाधान देणाऱ्या आणि उत्साह वाढविणाऱ्या असल्या, तरी त्यांतील जोर किती दिवस टिकेल, हा खरा कळीचा प्रश्न आहे.
           अण्णांना तिहारमध्ये पाठवून वेगळ्या खोलीत ठेवल्याचे वृत्त आता आले आहे. ज्या तुरुंगात सुरेश कलमाडी, ए. राजा व कनिमोळी यांसारखे भ्रष्टाचाराच्या माळेतील मणी राहत आहेत, त्याच तुरुंगात भ्रष्टाचाऱ्यांच्या विरोधात रान उठविणारे अण्णा हजारे राहावेत, हे या देशाच्या न्यायव्यवस्थेचे क्रूर चित्र आहे. केवळ अण्णांच्या आंदोलनातून लोकक्षोभ होईल, म्हणून प्रतिबंधात्मक कारवाई करणाऱ्या सरकारने माध्यम आणि जनतेच्या भावना लक्षात न घेता, त्यांनी वेळोवेळी दिलेल्या इशाऱ्यांकडे कानाडोळा करून कलमाडी व राजांसारख्यांना मोकळे रान दिले.  इकडे महाराष्ट्रात शेतकऱ्यांवर गोळीबार करणारे दादा लोक सुखैनेव फिरत आहेत. सरकारला दादागिरी चालते, भाईगिरी चालते पण लोकहीताच्या दृष्टीने उपास करणाऱ्यांची अण्णागिरी चालत नाही. ती का, हा खरा प्रश्न आहे आणि या आंदोलनातून त्या प्रश्नाचे उत्तर मिळाले, तर या सगळ्या घडामोडींचे चीज झाले असे म्हणता येईल.

महाबळेश्वरचे गौडबंगाल-१

mahabaleshwar         वाई सोडून गाडी महाबळेश्वरच्या दिशेने पुढे जात होती तशी मला प्रचंड उत्सुकता लागली होती. महाराष्ट्रातील सर्वात प्रसिद्ध पर्यटनस्थळाला पहिल्यांदा भेट देताना बहुतेक सर्वांना अशीच उत्सुकता वाटत असावी, असा माझा होरा आहे. पांचगणी येता येता मात्र ती उत्सुकता कुठल्या कुठे पळून गेली होती. पांचगणीच्या अलीकडे एक किलोमीटर पासूनच धंदा आणि लूटमार यांचे अफलातून मिश्रण वारंवार आढळत जातं. या लुटमारीला कितीही शिताफीने चुकविले, तरी कोणीकडून आपण इथे आलो, असा प्रश्न मनाशी पडला होता. त्याचवेळेस लोकं मुकाट अशा गैरप्रकारांपुढे मान तुकवितात याचं बिलकुल आश्चर्य वाटलं नाही. महाबळेश्वरच्या पहिल्या दोन भेटींत निर्माण झालेली ही प्रतिमा.

      वर्ष २०११ सुरू झाल्यानंतर पहिल्या पंधरवड्यात दोनदा या गिरीस्थानाची भेट घेतली. १८३०, म्हणजे मराठ्यांकडून हिंदुस्थान घेतल्यानंतर १२ वर्षांच्या आत, ब्रिटीश अधिकाऱ्यांनी महाबळेश्वरचा शोध लावला, असं सांगितलं जातं. तसं पाहिलं तर हे स्थान लोकांना अज्ञात होते, यावर माझा विश्वास नाही. वास्तविक बारा ज्योतिर्लिंगांतील एक असल्याने आणि प्रतापगडाशी अगदीच सलगी राखून असल्याने महाबळेश्वरला त्यापूर्वी लोक जातच असत. महाराष्ट्रात थंड हवेच्या जागा काय कमी आहेत? प्रतापगड, पन्हाळा किंवा अन्य ठिकाणीही थोड्याफार फरकाने अशीच स्थिती आहे. मात्र त्या स्थळांशी मराठ्यांचा इतिहास उज्ज्वल जोडलेला आहे. त्याची आठवण लोकांपुढे सतत राहील व आपल्या सत्तेला धोका निर्माण होईल, ही ब्रिटीशांना काळजी होती. यासाठी इतिहासाचा छाप नसलेल्या जागा ब्रिटीशांना हव्या होत्या. महाबळेश्वर किंवा माथेरान यांसारख्या जागांनी ती पूर्ण केली.

     महाबळेश्वरला कुठलाही किल्ला किंवा ऐतिहासिक स्थळ नव्हते. पुरातन मंदिर होते ते आधीच मोडकळीला आलेले आणि दूर होते. फुकटाच्या कमाईवर जगणाऱ्या अधिकाऱ्यांच्या ऐष-आरामासाठी याहून अधिक चांगली जागा मिळणे अवघड होते. त्यानंतरच्या १७० वर्षांत चैन, मौजमजा आणि चंगळ याचे पर्याय म्हणून महाबळेश्वर पुढे आले. ब्रिटीश असेपर्यंत त्यांचा वचक होता. त्यानंतर काळ्या साहेबांच्या काळात ‘एकमेकां साह्य करू, अवघे लुटू पर्यटक’चे खेळ सुरू झाले.

     जानेवारीच्या सुरवातीला पुणे आणि नाशिकमध्ये पारा तीन-चार अंश सेल्सियसवर घुटमळत असताना महाराष्ट्रातील काश्मीर समजले जाणारे महाबळेश्वर १० अंश सेल्सियसच्या खाली यायला तयार नव्हते. त्याचवेळेस वेण्णा तलाव किंवा अशाच कुठल्या जागी बर्फाचे थर साचल्याच्या बातम्या आणि छायाचित्रे दरवर्षीचा नेम पाळून यायला सुरूवात झाली. यामागचे गौडबंगाल आहे तरी काय, याचा अदमास घ्यावा म्हणून आम्ही तेथे गेलो होतो. तिथे जे काही पाहिलं, त्यावरून रहस्यामागचा पडदा संपूर्ण उठला नाही तरी थोडीफार चुणूक पाहायला मिळाली.

     पाचगणी आणि महाबळेश्वर दोन्ही जागी प्रवेश करताना पर्यटकांना प्रति माणशी ५० रुपयांचा प्रदूषण कर द्यावा लागतो. १९८० मध्ये इंदिरा गांधींच्या कृपेने हा भाग पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र जाहीर झाल्याने हा कर. पूर्वीच्या काळी पाप केलं म्हणून भट मंडळी काहीतरी प्रायश्चित सांगायचे आणि यजमान त्याप्रमाणे करून आपला अपराधभाव कमी करायचे, त्याचा हा आधुनिक अवतार. प्रदूषण कर भरून उजाड होणाऱ्या सह्याद्रीच्या डोंगररांगांवर कोणते उपकार होणार आहेत, हे कर घेणारे आणि भरणारेच जाणोत.

    गेली अनेक वर्षे लाखो लोकांनी इमाने इतबारे हा कर भरूनही महाबळेश्वरच्या पर्यावरणात खूप सुधारणा झाली आहे, असं दिसून येत नाही. तो कमी म्हणून की काय, प्रत्येक पॉईंटवर प्रवेश करताना पर्यटकांना वेगळे शुल्क द्यावे लागते. शिवाय पार्किंग शुल्क (रु ३०) वेगळे. आता पार्किंगची जागा म्हणाल तर चोहोबाजूंनी झाडांनी वेढलेला धुळीचा एखादा ढिगाराही तुम्हाला पार्किग प्लेस म्हणून दाखविल्या जाऊ शकतो.